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== साध्य पक्ष == भागवत मत का सर्वश्रेष्ठ मान्य ग्रंथ है : श्रीमद्भागवत जो अष्टादश पुराणों में अपने विषयविवेचन की प्रौढ़ता तथा काव्यमयी सरसता के कारण सबसे अधिक महत्वशाली है (दे. 'भागवत')। भागवत के सिद्धांत भागवतधर्म के महनीय तथा माननीय सिद्धांत हैं। भागवत का कथन है कि परमार्थत: एक ही अद्वय ज्ञान है। वही ज्ञानियों के द्वारा 'ब्रह्म', योगियों के द्वारा 'परमात्मा' तथा भगवद्भक्तों के द्वारा 'भगवान्' कहा जाता है। भेद है उपासकों की दृष्टि का तथा उपासना के केवल तारतम्य का। एक अभिन्न परम तत्व नाना उपासना की दृष्टि में भिन्न प्रतीत होता है, परंतु वह अभिन्न अद्वयज्ञान रूप : वदंति तत् तत्वविदस्तत्वं. यज् ज्ञानमद्वयम् ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते।: (भाग. 1.2:11) शक्तियों की संपत्ति ही भगवान् की भगवत्ता है। यह शक्ति एक न होकर अनेक हैं तथा अचिंतनीय है। अचिंत्यशक्ति का निवास होने के कारण वह 'लीलापुरुषोत्तम' है। इसी के कारण वह एक होते हुए भी अनेक प्रतीत होता है और भासित होने पर भी वह वस्तुत: एक है। इसीलिए वह बहुमूर्तिक होने पर भी एकमूर्तिक है (यजंति त्वन्मयास्त्वाँ वै बहुमूल्येकमूर्तिकम्, भाग. 10.40.7)। विष्णुपुराण के 'एकाने स्वरूपाय' तथा गोपालतापिनी के 'एकोऽपि सन् बहुधा यो विभाति' वाक्य का लक्ष्य इसी अचिंत्य शक्ति की ओर है। इसी शक्ति के कारण भगवान् आश्रयशून्य, शरीररहित तया स्वयं अगुण होते हुए भी अपने स्वरूप के द्वारा ही इस सगुण विश्व की सृष्टि, स्थिति तथा संहार करते हैं, परंतु इन व्यापारों की सत्ता होने पर भी उनमें किसी भी प्रकार का बिकार उत्पन्न नहीं होता। इसलिए भगवान् का विहारयोग दु:खबोध है, समझने में नितांत कठिन है : दु:खबोध एवायं तव विहारयोग:, यद् अशरणो शरीर इदमनवेक्षि तात्मत्समवाय आत्मनैव अविक्रियमाणेन सगुणमगुण: सृजसि पासि हरसि (भाग. 6.9.34)। इस प्रकार भगवान् का स्वरूप तीन प्रकार का प्रतीत होता है : * (क) स्वयंरूप * (ख) तदेकात्मक रूप और * (ग) आवेशरूप। इनमें 'स्वयंरूप' ही अनन्यापेक्षी मुख्यरूप है। सच्चिदानंद विग्रह, परम सौंदर्यनिकेतन, परमनयनाभिराम स्वयंरूप ही भगवान् का सर्वश्रेष्ठ रूप है। 'तदेकात्मकरूप' स्वयंरूप के साथ एकता रखने पर भी आकृति, आकार तथा चरितादिकों के द्वारा उससे भिन्न के समान प्रतीत होता है। शक्तियों के उत्कर्ष और ्ह्रास के कारण इस रूप में दो प्रकार होते हैं : विलास तथा स्वांश। 'विलास' का रूप मूलरूप से आकृति में भिन्न रहता है, परंतु गुणों में वह प्राय: समान ही होता है। विलास में शक्ति का प्राकट्य अधिक होता है, परंतु 'स्वांश' में शक्ति का प्राकट्य तदपेक्षया न्यून होता है। स्वयंरूप के अनंत गुणों की सत्ता होने पर भी 64 गुणों का अस्तित्व और उनमें भी चार गुणों का अस्तित्व सर्वदा तथा सर्वथा माना जाता है। ये गुण हैं : * (1) लोकों को चमत्कृत करनेवाली लीला, * (2) प्रेम द्वारा सुशोभित 'प्रियमंडल', * (3) चराचर को मुग्ध करनेवाली रूपमाधुरी तथा * (4) जड़चेतन को विस्मित करनेवाला मुरलीनिनाद। कृष्ण में इन चारों का सद्भाव उनकी भगवत्ता सिद्ध करने का परम उपाय है। 'आवेश' रूप में भगवान् जीवों में न्यूनाधिक रूप से अपनी शक्ति का आधान करते हैं। यह उनका सबसे छोटा रूप माना जाता है।
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