सामग्री पर जाएँ
मुख्य मेन्यू
मुख्य मेन्यू
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
मार्गदर्शन
मुखपृष्ठ
हाल में हुए बदलाव
बेतरतीब पृष्ठ
मीडियाविकि के बारे में सहायता
भारतपीडिया
खोजें
खोजें
दिखावट
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
व्यक्तिगत उपकरण
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
लॉग-आउट किए गए संपादकों के लिए पृष्ठ
अधिक जानें
योगदान
वार्ता
"
महाराज गुलाब सिंह
" (अनुभाग) सम्पादित करें
पृष्ठ
चर्चा
हिन्दी
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
उपकरण
उपकरण
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
क्रियाएँ
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
सामान्य
कड़ियाँ
पृष्ठ से जुड़े बदलाव
विशेष पृष्ठ
पृष्ठ की जानकारी
दिखावट
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
चेतावनी:
आपने लॉग-इन नहीं किया हुआ है। अगर आप सम्पादन करते हैं तो इस पृष्ठ के सम्पादन इतिहास में आपका IP पता दृश्य होगा। अगर आप
लॉग-इन
करते हैं या
खाता बनाते हैं
तो दूसरी सुविधाओं के साथ-साथ आपके सम्पादनों का श्रेय आपके सदस्यनाम पर दिया जाएगा।
ऐन्टी-स्पैम जाँच। इसे
नहीं
भरें!
===बचपन एवं प्राथमिक जीवन=== [[File:The Hill fort of Maharaja Gulab Singh, 1846 drawing.jpg|right|250px|thumb|सन् १८४६ की एक हस्थचित्र, महाराज गुलाब फिंह का गिरीदुर्ग]] गुलाब सिंह का जन्म १८ अकटूबर १७९२ में जम्मू के एक जामवल [[डोगरा राजपूत]] परिवार में हुआ था। उनके पिता श्री किशोर सिंह जामवल, जम्मू के ततकालीन नरेश, [[राजा जीत सिंह]], जम्मू के राजा के दूरस्थ कुलसम्बंधी थे। उनकी परवरिश उनके दादा, श्री ज़ोरावर सिंह के मद्देनज़र हुआ था, जिनसे उन्होंने युद्धकला, तलवारबाज़ी और घुड़सवारी सीखी। सन् १८०८ में जब [[महाराजा रणजीत सिंह|महाराज रणजीत सिंह]] की [[सिख साम्राज्य|सिख सेना]] ने [[जम्मू]] पर चढ़ाई की थी, तब गुलाब सिंह की उम्र १६ साल थी जब उन्होंनें अपनी कुलवंशियों के कंधे से कंधा मिला कर [[जम्मू]] के बचाव की पुरज़ोर पर नाक़ामयाब कोशिश की थी। इस हार के बाद [[जम्मू]] रियासत को [[सिख साम्राज्य]] के अधिराज्य में तब्दील कर दिया गया, अर्थात जम्मू, सिख साम्राज्य के आधीन आ गया हालांकी जम्मू के राजा को [[क्षेत्रिय स्वायत्तता]] हासिल थी। सन् १८०९ में गुलाब सिंह ने [[काबुल]] का रुख़ किया, अफ़ग़ान राजा, शूजा शाह दुर्रैनी की फ़ौज में एक तनख़्वादार फ़ौजी के रूप में दाख़िला लेने के लिये। जब उसकी फ़ौज ने सिंध को पार करने से इनक़ार कर दिया तब उन्होंने कुछ समय के लिये सरदार निहाल सिंह अटारिवाला के लिये भी काम किया, जिसके बाद उनका दाख़िला, [[महाराजा रणजीत सिंह|महाराज रणजीत सिंह]] के [[दरबार]] में एक पैदल-सैनिक के रूप में हुआ। अपने शौर्य एवं रणकौशल के बदौलत उन्होंने कई सैन्य-कार्रवाईयों में काफ़ी शौहरत एवं सम्माल हासिल किय, विशेश रूप से [[मुल्तान|मुलतान]] की चढ़ाई में। इसके दम पर उन्होंने सेना में खुद को एक विशिष्ट सैनिक के रूप में स्थापित कर लिया था। यहां तक की उन्हों ने एक बार [[रेसाई]] पर किये गए फ़ौजी-कार्रवाई का स्वतंत्र नेत्रित्व भी किया था। १८१६ में एक और टकराव के पश्चात, रणजीत सिंह ने जम्मू पर पूरी तरह कबज़ कर लिया और राजा जीत सिंह को साम्राज्य से बरख़ास्त कर दिया। जीत सिंह ने दक्षिण में स्थित [[ब्रिटिश भारत के प्रेसीडेंसी और प्रांत|ब्रिटिश भारत]] पनाह ले लिया। रणजीत सिंह ने इस नए इलाके की हुकूमत के लिए एक जागीरदार की नियुक्ती की और १८२० में गुलाब सिंह एवं उनके परिवार की मुलाज़मत का अभिमूल्यन करते हुए [[महाराजा रणजीत सिंह|महाराज रणजीत सिंह]] ना जम्मू को एक वंशानुगत जागीर के रूप में किशोर सिंह को सौंप दिया। सन् १८२१ में गुलाब सिंह ने [[राजौरी]] को अग़र ख़ान से और किश्तवाड़ को राजा तेग़ मुहम्मद ख़ान से कब्ज़ा किया। उसी साल गुलाब सिंह ने डेरा ग़ाज़ी ख़ान पर की गई सैन्य-कार्रवाई में भी भाग लिया। इतना ही नहीं, उन्हों ने अपने ही कुलवंशी मियां डिदो सिंह जामवल को, जो [[सिख साम्राज्य|साम्राज्य]] के खिलाफ़ विद्रोह का नेत्रित्व कर रहा था, पकड़ कर प्राणदंड दे दिया था।
सारांश:
भारतपीडिया पर किया कोई भी योगदान अन्य सदस्यों द्वारा बदला जा सकता है और हटाया भी जा सकता है। अगर आपको अपने लिखे हुए पाठ में संपादन होना नामंजूर है तो यहाँ पर न लिखें।
आप हमें यह भी वचन देतें हैं कि यह आपने स्वयं लिखा है अथवा सार्वजनिक क्षेत्र या किसी समान मुक्त स्रोत से प्रतिलिपित किया है (अधिक जानकारी के लिये
भारतपीडिया:कॉपीराइट
देखें)।
कॉपीराइट सुरक्षित कार्यों को बिना अनुमति के यहाँ न डालें!
रद्द करें
सम्पादन सहायता
(नए विंडो में खुलता है)