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==प्रयोग की व्यवस्था== [[चित्र:Interferometre Michelson.svg|thumb|300px|right|माइकेल्सन का व्यतिकरणमापी:<br />A - एकवर्णी प्रकाश स्रोत<br />B - अर्धपरावर्तनकारी दर्पण<br />C - दर्पण <br />D - संसूचक (डिटेक्टर)]] [[चित्र:Michelson-Morley experiment (en).svg|300px|thumb|right|माइकेल्सन के व्यतिकरणमापी का योजनामूलक चित्र (किन्तु इसमें [[लेसर किरण|लेजर]] का उपयोग किया गया है।]] [[चित्र:Michelson-morley calculations.svg|300px|thumb|right|माइकेल्सन-मार्लि प्रयोग में परस्पर दो अभिलम्ब दिशाओं में कोई फेज-शिफ्ट नहीं मिला, किन्तु '''ईथर''' की मौजूदगगी में ऐसा होना चाहिये था।]] बांयी ओर से एक प्रकाश किरण दर्पण '''B''' पर आती है। यह दर्पण, अर्ध दर्पण है जिस पर [[चाँदी]] का पतला स्तर होता है, जिससे केवल ५० प्रतिशत प्रकाश [[परावर्तन|परावर्तित]] होकर दूसरे दर्पण '''C''' (इसको C1 मानें) की ओर जाता है और शेष ५० प्रतिशत प्रकाश पारगमित होकर सीधा तीसरे दर्पण '''C''' (इसको C2 मानें) दर्पण पर आपतित होता है। ये दोनो दर्पण '''C''' एक-दूसरे के लम्बवत हैं। प्रकाश के ये दो किरणपुंज क्रमश: दोनों '''C''' दर्पणों से परावर्तित होकर पुन: '''B''' दर्पण पर आपतित होती है और प्रेक्षक इन दोनों किरणों के द्वारा [[व्यतिकरण (तरंगों का)|व्यतिकरण]] की धारियों (fringes) को एक साथ देख सकता है। यदि '''B''' से दोनों '''C''' दर्पण समान दूरी पर हों तो, इन धारियों में से केंद्रीय धारी चमकीली होती है। '''B''' दर्पण से दोनों '''C''' दर्पणों की दूरी में बहुत थोड़ा अन्तर भी हो तो इन दो प्रकाशकिरणों में से एक को पहुँचने में उसी के अनुपात में थोड़ा विलंब होगा और केंद्रीय धारी स्वल्प मात्रा में विचलित होगी। केंद्रीय धारी के स्थान विचलन के मापन से इन दो किरणों के संचरण (propagation) के काल का अंतर ज्ञात हो सकता है। '''B''' से '''C1''' और '''C1''' के अंतर यद्यपि ठीक-ठीक बराबर हों, किंतु मान लें किसी कारण '''BC1''' और '''BC2''' परस्पर अभिलंब दिशाओं में प्रकाश का वेग भिन्न होता हो, तो भी केंद्रीय धारी विस्थापित होगी और इस विस्थापन का मापन कर इन दो दिशाओं में प्रकाश के वेग ज्ञात किए जा सकते हैं। ईथर की परिकल्पना के अनुसार प्रकाश का वेग इन दो अभिलंब दिशाओं में भिन्न होना स्वाभाविक तथा आवश्यक होना चाहिए। [[न्यूटनीय अंतरिक्ष]] एक स्वतंत्र सत्ता है और उसमें ईथर भरा हुआ है। यह ईथर स्थिर होता है। जब पृथ्वी इस स्थिर ईथर में सूर्य की परिक्रमा करती है, तब 'ईथरवात' (ether wind) उत्पन्न होगा। हम कल्पना करेंगे कि 'ईथरवात' '''BC2''' दिशा में है (अर्थात '''BC2''' पृथ्वी का तल है) और उसका वेग व (v) है। यह वेग वस्तुत: केवल पृथ्वी की सौर परिक्रमा का ही वेग नहीं रहेगा किंतु पृथ्वी की सौर परिक्रमा का वेग, सौर मंडल का वेग, आकाशगंगा (जिसमें सौर मंडल है) का वेग इत्यादि सर्वसंभाव्य वेगों का परिणामी वेग होगा। '''BC2''' दिशा में प्रकाशकिरण का प्रथम संचरण (c+v) वेग से और लौटते समय संचरण (c-v) वेग से होगा, जहाँ (c) प्रकाश का वेग है। '''BC1''' दिशा 'ईथरवात' से अभिलंब है। '''माइकेल्सन-मॉर्लि प्रयोग में केंद्रीय धारी का विस्थापन नहीं हुआ'''। यह संभव है कि 'ईथरवात' जैसा '''BC2''' दिशा में समझा गया वैसा नहीं होगा, किंतु किसी अन्य दिशा में होगा। इस शंका का भी निरसन इस प्रयोग में हुआ। माइकेल्सन-मॉर्लि प्रयोग में व्यतिकरणमापी एक शिला पर दृढ़ता से स्थापित था, जिसका पृष्ठ १५० सेंमीo और मोटाई ३० सेमी० थी (सबसे ऊपर वाला चित्र देखें)। लोहे के वृत्तीय हौदे में पारा भरकर उसमें यह शिला रखी गई थी और शिला व्यतिकरणमापी सहित पारे में तैर सकती थी। व्यतिकरणमापी को इस प्रकार तैरता रखने से दो लाभ थे : एक तो कंपनों से होने वाला उपद्रव नष्ट हो गया और दूसरा, प्रयोग करते समय व्यतिकरणमापी को पूर्णत: घुमाना संभव हुआ। इस प्रकार व्यतिकरणमापी के घुमाते समय किसी एक क्षण पर '''BC2''' दिशा 'ईथरवात' की दिशा में और '''BC1''' श्दिशा अभिलंब होगी। अत: प्रेक्षण करते समय व्यतिकरणमापी को घूर्णन दिया जाए तो केंद्रीय धारी का विस्थापन क्रमश: कम अथवा अधिक होता रहेगा, अथवा दूसरे शब्दों में केंद्रीय धारी का विशिष्ट अंतर में [[दोलन]] होता रहेगा। प्रयोग का अधिक संवेदी बनाने के लिए, प्रकाश के पथों की वृद्धि की गई थी, जिसके लिये व्यतिकरण के पूर्व दर्पणों से प्रकाशकिरणों का बार-बार परावर्तन किया गया था। '''आवश्यक सुधार तथा सावधानियाँ रखने पर भी केंद्रीय धारी का विस्थापन नहीं हुआ''' और जो कुछ अत्यंत स्वल्प मात्रा का विचलन प्राप्त हुआ वह प्रायोगिक त्रुटि के अंतर्गत था। '''अत: 'ईथरवात' का अस्तित्व प्रामाणित नहीं हुआ।''' माइकेल्सन-मॉर्लि प्रयोग की शृंखला के परिणामों को संक्षेप में इस तरह कह सकते हैं कि ईथर में घूमती हुई पृथ्वी का वेग प्रकाश के वेग पर कोई प्रभाव नहीं डालता है, अत: प्रकाश के वेग की सहायता से पृथ्वी का वेग नहीं ज्ञात किया जा सकता।
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