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==राजनीतिशास्त्र की परम्परा== भारतीय साहित्य में राजनीति-विषयक ग्रन्थों के निर्माण की परम्परा बहुत प्राचीन है। [[कल्पसूत्र]] उसके आदि स्रोत हैं, जिनका निर्माण लगभग ७०० ई० पूर्व में हो चुका था। [[धर्म]] और [[अर्थ]] के साथ राजनीति की विस्तृत चर्चाएँ [[धर्मसूत्र|धर्मसूत्रों]], विशेषरूप से [[बौधायन धर्मसूत्र]] में देखने को मिलती हैं। इस दृष्टि से बौद्ध [[जातक कथाएँ|जातकों]] के सन्दर्भ भी महत्त्वपूर्ण हैं, जिनकी रचना [[तथागत]] से पहले लगभग ६००ई० पूर्व में मानी जाती है। जातकों में अर्थ के अन्तर्गत ही राजनीति का समन्वय किया गया है और उसे प्रमुख विज्ञान के रूप में माना गया है। राजनीति-विषयक बातों की विस्तृत चर्चा '[[महाभारत]]' ( ५०० ई० पूर्व) में देखने को मिलती है । 'महाभारत' के [[शान्तिपर्व]] ( अध्याय ५८, ५९ ) में इस परम्परा के प्राचीन आचार्यों का उल्लेख हुआ है। उनमें [[प्रजापति]] के 'राजशास्त्र' का भी उल्लेख हुआ है। इससे ज्ञात होता है कि राजनीति को एक प्रमुख विषय के रूप में माना जाने लगा था। [[कौटिल्य]] का '[[अर्थशास्त्र (ग्रन्थ)|अर्थशास्त्र]]' ( ३०० ई० पूर्व) इस विषय का प्रौढ़ ग्रन्थ है। उसके अध्ययन से ज्ञात होता है कि राजनीति को एक स्वतन्त्र शास्त्र के रूप में मान्यता प्राप्त हो गई थी। राजनीति पर लिखा गया आचार्य [[उशनस्]] का 'दण्डनीतिशास्त्र' सम्भवतः इस परम्परा का ग्रन्थ था, जिसका उल्लेख [[विशाखदत्त]] के '[[मुद्राराक्षस]]' (१७ ) में देखने को मिलता है। उसके बाद लगभग चौथी शती ई० तक धर्म और अर्थ विषय पर लिखे गये ग्रन्थों में राजनीति की विस्तृत चर्चाएं देखने को मिलती हैं। धर्म और अर्थ का प्रमुख अङ्ग होने के कारण राजनीति का महत्त्व सभी धर्मवक्ताओं एवं अर्थशास्त्रियों ने स्वीकार किया। राजनीति पर एक सर्वाङ्गीण बृहद् ग्रन्थ की रचना [[शुक्राचार्य|आचार्य शुक्र]] ने की थी, जिसको कि '[[शुक्रनीतिसार]]' के नाम से कहा जाता है। इस ग्रन्थ का उल्लेख मध्ययुगीन [[स्मृति]]कारों ने किया है। अनेक ग्रन्थों में उसके उदाहरण भी देखने को मिलते हैं। 'राजनीति-रत्नाकर' में भी उसके अंश उद्धृत हैं। आचार्य शुक्र के राजनीति-विषयक ग्रन्थ के आधार पर ४०० ई० के लगभग आचार्य [[कामन्दक]] ने '[[नीतिसार]]' के नाम से एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ की रचना की। विद्वानों का अभिमत है कि कामन्दकीय 'नीतिसार' भी अपने मूल रूप में उपलब्ध नहीं है। सम्प्रति उसका जो रूप उपलब्ध है, वह १७ वीं श० ई० का पुनः संस्करण है। राजनीति-विषयक चर्चाओं की दृष्टि से [[पुराण|पुराणों]] का विशेष महत्त्व है। '[[अग्निपुराण]]' और '[[मत्स्यपुराण]]' इस दृष्टि से उल्लेखनीय हैं। इन दोनों पुराणों के उल्लेखों से ज्ञात होता है कि वे अपने पूर्ववर्ती राजनीति-विषयक ग्रन्थों की प्रौढ़ परम्परा के सूचक हैं। इन पुराणों की रचना ५वीं से ७वीं श० ई. के बीच मानी जाती है। इस परम्परा में आचार्य बृहस्पति के 'अर्थशास्त्र' और [[सोमदेव]] के 'नीतिवाक्यामृत' का नाम विशेषरूप से उल्लेखनीय है। बृहस्पति का 'अर्थशास्त्र' अपने मूल रूप में बहुत प्राचीन है, किन्तु जिस रूप में आज वह उपलब्ध है उसे ९वीं-१०वीं श० ई० का पुनः संस्करण बताया जाता है। 'नीतिवाक्यामृत' को भी इसी समय की रचना माना जाता है। उसके रचनाकार सोमदेव '[[कथासरित्सागर]]' के रचयिता से भिन्न थे। ऐसा प्रतीत होता है कि १०वीं श० ई. के बाद विद्वानों का ध्यान राजनीति विषय की ओर विशेष रूप से केन्द्रित हुआ। इस सन्दर्भ में जैनाचार्य [[हेमचन्द्राचार्य|हेमचन्द्र]] ( १२ वीं श०) का 'लघ्वर्हनीति' और धारानरेश [[राजा भोज|भोज]] (१२ वीं श०) का 'युक्तिकल्पतरु' का नाम विशेषरूप से उल्लेखनीय है। १४वीं से १८वीं श० ई० के बीच इस विषय पर जिन महत्त्वपूर्ण कृतियों का निर्माण हुआ उनमें 'राजनीति रत्नाकर', 'राजनीति कल्पतरु', 'राजनीति कामधेनु', 'वीरमित्रोदय' और 'राजनीति मयूख' का नाम उल्लेखनीय है। प्रथम तीन ग्रन्थों के निर्माता चण्डेश्वर या चन्द्रशेखर और अन्त के दोनों ग्रन्थों के निर्माता क्रमशः मित्रमिश्र और नीलकण्ठ हैं।<ref>[https://archive.org/details/wg242/page/n5/mode/2up राजनीतिशास्त्र और उसकी परम्परा]</ref>
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