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== ऋग्वेद में सन्दर्भ == [[चित्र:Saraswati.jpg|thumb|right|200px|[[राजा रवि वर्मा]] द्वारा निर्मित देवी सरस्वती का चित्र।]] * [[ऋग्वेद]] की चौथे पुस्तक (मंडल ?) को छोड़कर सरस्वती नदी का सभी (मंडलों) पुस्तकों (?) में कई बार उल्लेख किया गया है। केवल यही ऐसी नदी है जिसके लिए ऋग्वेद की ऋचा ६.६१,७.९५ और ७.९६ में पूरी तरह से समर्पित स्तवन दिये गये हैं। * '''प्रशस्ति और स्तुति''': ** वैदिक काल में सरस्वती की बड़ी महिमा थी और इसे 'परम पवित्र' नदी माना जाता था, क्यों कि इसके तट के पास रह कर तथा इसी नदी के पानी का सेवन करते हुए ऋषियों ने [[वेद]] रचे और वैदिक ज्ञान का विस्तार किया। इसी कारण सरस्वती को विद्या और ज्ञान की देवी के रूप में भी पूजा जाने लगा। ऋग्वेद के 'नदी सूक्त' में सरस्वती का इस प्रकार उल्लेख है कि 'इमं में गंगे यमुने सरस्वती शुतुद्रि स्तोमं सचता परूष्ण्या असिक्न्या मरूद्वधे वितस्तयार्जीकीये श्रृणुह्या सुषोमया'<ref>[[ऋग्वेद|ॠग्वेद]] 10,75,5</ref> सरस्वती, ऋग्वेद में केवल 'नदी देवी' के रूप में वर्णित है (इसकी वंदना तीन सम्पूर्ण तथा अनेक प्रकीर्ण मन्त्रों में की गई है), किंतु [[ब्राह्मण]] ग्रथों में इसे वाणी की देवी या वाच् के रूप में देखा गया, क्योंकि तब तक यह लुप्त हो चुकी थी परन्तु इसकी महिमा लुप्त नहीं हुई और [[वैदिक सभ्यता|उत्तर वैदिक काल]] में सरस्वती को मुख्यत:, वाणी के अतिरिक्त बुद्धि या विद्या की अधिष्ठात्री देवी भी माना गया। ब्रह्मा की पत्नी के रूप में इसकी वंदना के गीत गाये गए हैं **ऋग्वेद में सरस्वती को नदीतमा की उपाधि दी गयी है। उसकी एक शाखा २.४१.१६ में इसे "सर्वश्रेष्ठ माँ, सर्वश्रेष्ठ नदी, सर्वश्रेष्ठ देवी" कह कर सम्बोधित किया गया है। यही प्रशंसा ऋग्वेद के अन्य छंदों ६.६१,८.८१,७.९६ और १०.१७ में भी की गयी है। ** ऋग्वेद के मंत्र ७.९.५२ तथा अन्य जैसे ८.२१.१८ में सरस्वती नदी को "दूध और घी" से परिपूर्ण बताया गया है। ऋग्वेद के श्लोक ३.३३.१ में इसे 'गाय की तरह पालन करने वाली' बताया गया है ** ऋग्वेद के श्लोक ७.३६.६ में सरस्वती को सप्तसिंधु नदियों की जननी बताया गया है।
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