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== माहात्म्य == :'''पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम्।'''<br /> :'''मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते ॥''' पृथ्वी पर जल, अन्न और सुभाषित - ये तीन रत्न है। (किन्तु) मूढ लोग पत्थर के टुकडे को "रत्न" संज्ञा से पहचानते हैं ! :'''सुभाषितमयैर्द्रव्यैः संग्रहं न करोति यः।'''<br /> :'''सोऽपि प्रस्तावयज्ञेषु कां प्रदास्यति दक्षिणाम्।।''' (यः सुभाषित-मयैः द्रव्यैः संग्रहं न करोति सः अपि प्रस्ताव-यज्ञेषु कां दक्षिणाम् प्रदास्यति ?) '''भावार्थ''' : सुभाषित कथन रूपी संंपदा का जो संग्रह नहीं करता वह प्रसंगविशेष की चर्चा के यज्ञ में भला क्या दक्षिणा देगा? समुचित वार्तालाप में भाग लेना एक यज्ञ है और उस यज्ञ में हम दूसरों के प्रति सुभाषित शब्दों की आहुति दे सकते हैं। ऐसे अवसर पर एक व्यक्ति से मीठे बोलों की अपेक्षा की जाती है, किंतु जिसने सुभाषण की संपदा न अर्जित की हो यानी अपना स्वभाव तदनुरूप न ढाला हो वह ऐसे अवसरों पर औरों को क्या दे सकता है ? :'''संसारकटुवृक्षस्य द्वे फले अमृतोपमे।''' :'''सुभाषितरसास्वादः संगतिः सुजने जने॥''' (संसार-कटु-वृक्षस्य अमृत-उपमे द्वे फले, सुभाषित-रस-आस्वादः सुजने जने संगतिः।) '''भावार्थ''' : संसार रूपी कड़ुवे पेड़ से अमृत तुल्य दो ही फल उपलब्ध हो सकते हैं, एक है मीठे बोलों का रसास्वादन और दूसरा है सज्जनों की संगति। यह संसार कष्टों का भंडार है, पग-पग पर निराशाप्रद स्थितियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे संसार में दूसरों से कुछएक मधुर बोल सुनने को मिल जाएं और सद्व्यवहार के धनी लोगों का सान्निध्य मिल जाए तो आदमी को तसल्ली हो जाती है। मीठे बोल और सद्व्यवहार की कोई कीमत नहीं होती है, परंतु ये अन्य लोगों को अपने कष्ट भूलने में मदद करती हैं। कष्टमय संसार में इतना ही बहुत है। :'''भाषासु मुख्या मधुरा दिव्या गीर्वाण-भारती'''।<br /> :'''तस्माद्धि काव्यम् मधुरं तस्मादपि सुभाषितम्'''॥ '''अर्थ''' : भाषाओं में मुख्य, मधुर और दिव्य भाषा संस्कृत है। उसमें भी [[काव्य]] मधुर है। और काव्य में भी सुभाषैत। : ''द्राक्षाम्लानमुखी जाता, शर्करा चाश्मगतां गता। : ''सुभाषितरसस्याग्रे सुधा भीता दिवंगता॥ '''अर्थ''' : सुभाषितरस के आगे द्राक्षा (अंगूर) का मुख म्लान (खट्टा) हो गया, शर्करा खड़ी हो गयी और [[अमृत]] डरकर [[स्वर्ग लोक|स्वर्ग]] चली गयी।
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