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== इतिहास == [[चित्र:Somnath temple ruins (1869).jpg|thumb|right|300px| 1869 में सोमनाथ मंदिर के अवशेष]] सर्वप्रथम एक मन्दिर ईसा के पूर्व में अस्तित्व में था जिस जगह पर द्वितीय बार मन्दिर का पुनर्निर्माण सातवीं सदी में [[वल्लभीपुर|वल्लभी]] के मैत्रक राजाओं ने किया। आठवीं सदी में [[सिन्ध]] के अरबी गवर्नर ''जुनायद'' ने इसे नष्ट करने के लिए अपनी सेना भेजी। गुर्जर प्रतिहार राजा नागभट्ट ने 815 ईस्वी में इसका तीसरी बार पुनर्निर्माण किया। इस मन्दिर की महिमा और कीर्ति दूर-दूर तक फैली थी। [[अरब]] यात्री [[अल-बरुनी]] ने अपने यात्रा वृतान्त में इसका विवरण लिखा जिससे प्रभावित हो [[महमूद ग़ज़नवी]] ने सन 1024 में कुछ 5,000 साथियों के साथ सोमनाथ मन्दिर पर हमला किया, उसकी सम्पत्ति लूटी और उसे नष्ट कर दिया। 50,000 लोग मन्दिर के अन्दर हाथ जोड़कर पूजा अर्चना कर रहे थे, प्रायः सभी कत्ल कर दिये गये।<ref>{{cite web|url= http://www.experiencefestival.com/a/Mahmud_of_Ghazni_-_Military_campaigns/id/5269269|title= Mahmud of Ghazni - Military campaigns|access-date= [[14 अप्रैल]] [[2008]]|format= |publisher= वननेस कमिटमेंट|language= अंग्रेज़ी|archive-url= https://web.archive.org/web/20080618162055/http://www.experiencefestival.com/a/Mahmud_of_Ghazni_-_Military_campaigns/id/5269269|archive-date= 18 जून 2008|url-status= live}}</ref><ref>{{cite web|url= http://nannu.pugmarks.com/dashora-family/notes/somnath.htm|title= Somnath Temple|access-date= [[14 अप्रैल]] [[2008]]|format= एचटीएम|publisher= नन्नूपुगमार्क्स.कॉम|language= अंग्रेज़ी|archive-url= https://web.archive.org/web/20071027051337/http://nannu.pugmarks.com/dashora-family/notes/somnath.htm|archive-date= 27 अक्तूबर 2007|url-status= dead}}</ref> इसके बाद गुजरात के राजा भीम और [[मालवा]] के राजा भोज ने इसका पुनर्निर्माण कराया। सन 1297 में जब [[दिल्ली सल्तनत]] ने गुजरात पर क़ब्ज़ा किया तो इसे पाँचवीं बार गिराया गया। मुगल बादशाह [[औरंगजेब]] ने इसे पुनः 1706 में गिरा दिया। इस समय जो मंदिर खड़ा है उसे भारत के गृह मन्त्री [[सरदार वल्लभ भाई पटेल]] ने बनवाया और पहली दिसम्बर 1955 को भारत के राष्ट्रपति डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया। 1948 में [[प्रभासतीर्थ]], 'प्रभास पाटण' के नाम से जाना जाता था। इसी नाम से इसकी तहसील और नगर पालिका थी। यह [[जूनागढ़]] रियासत का मुख्य नगर था। लेकिन 1948 के बाद इसकी तहसील, नगर पालिका और तहसील कचहरी का वेरावल में विलय हो गया। मंदिर का बार-बार खंडन और जीर्णोद्धार होता रहा पर शिवलिंग यथावत रहा। लेकिन सन 1048 में महमूद गजनी ने जो शिवलिंग खण्डित किया, वह यही आदि शिवलिंग था। इसके बाद प्रतिष्ठित किए गए शिवलिंग को 1300 में अलाउद्दीन की सेना ने खण्डित किया। इसके बाद कई बार मन्दिर और शिवलिंग को खण्डित किया गया। बताया जाता है [[आगरे का किला|आगरा के किले]] में रखे देवद्वार सोमनाथ मन्दिर के हैं। महमूद गजनी सन 1026 में लूटपाट के दौरान इन द्वारों को अपने साथ ले गया था। सोमनाथ मन्दिर के मूल मन्दिर स्थल पर मन्दिर ट्रस्ट द्वारा निर्मित नवीन मन्दिर स्थापित है। राजा [[कुमार पाल]] द्वारा इसी स्थान पर अन्तिम मन्दिर बनवाया गया था। सौराष्ट्र के मुख्यमन्त्री [[उच्छंगराय नवलशंकर ढेबर]] ने १९ अप्रैल १९४० को यहाँ उत्खनन कराया था। इसके बाद भारत सरकार के पुरातत्व विभाग ने उत्खनन द्वारा प्राप्त ब्रह्मशिला पर शिव का ज्योतिर्लिग स्थापित किया है। === भारत की स्वतन्त्रता के बाद पुनर्निर्माण=== सौराष्ट्र के पूर्व राजा दिग्विजय सिंह ने 8 मई 1950 को मन्दिर की आधारशिला रखी तथा ११ मई 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ॰ [[राजेंद्र प्रसाद]] ने मन्दिर में ज्योतिर्लिग स्थापित किया।<ref>{{cite web|url=http://indianexpress.com/article/explained/somnath-temple-rahul-gandhi-babri-demolition-ram-rath-yatra-ram-mandir-ayodhya-verdict-hindutvain-nehru-sardar-patel-4971403/|title=In Nehru vs Patel-Prasad on Somnath, a context of Partition, nation building|access-date=8 दिसंबर 2017|archive-url=https://web.archive.org/web/20171208122419/http://indianexpress.com/article/explained/somnath-temple-rahul-gandhi-babri-demolition-ram-rath-yatra-ram-mandir-ayodhya-verdict-hindutvain-nehru-sardar-patel-4971403/|archive-date=8 दिसंबर 2017|url-status=live}}</ref> नवीन सोमनाथ मन्दिर 1962 में पूर्ण निर्मित हो गया। 1970 में [[जामनगर]] की राजमाता ने अपने पति की स्मृति में उनके नाम से 'दिग्विजय द्वार' बनवाया। इस द्वार के पास राजमार्ग है और पूर्व गृहमन्त्री सरदार [[वल्लभ भाई पटेल]] की प्रतिमा है। सोमनाथ मन्दिर निर्माण में पटेल का बड़ा योगदान रहा। [[Image:PINQ3113.jpg|left|thumb|300px|बाणस्तम्भ (इसके शीर्ष में [[तीर|बाण]] देखिए)]] मन्दिर के दक्षिण में समुद्र के किनारे एक स्तम्भ है। उसके ऊपर एक [[तीर]] रखकर संकेत किया गया है कि सोमनाथ मन्दिर और [[दक्षिण ध्रुव]] के बीच में पृथ्वी का कोई भूभाग नहीं है (''आसमुद्रान्त दक्षिण ध्रुव पर्यंत अबाधितs ज्योतिर्मार्ग'')। इस स्तम्भ को '[[बाणस्तम्भ]]' कहते हैं। <ref>[https://books.google.co.in/books?id=A1acCwAAQBAJ&pg=PT76&lpg=PT76&dq=बाणस्तम्भ&source=bl&ots=8qz1kJpqxs&sig=b9e2KcgPHk5xb-96nCgodDeG-xM&hl=en&sa=X&ved=0ahUKEwj4y_jpr8PXAhXKMI8KHfs4ALMQ6AEIbjAO#v=onepage&q=%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AD&f=false Maritime Heritage of India] (By Indian Navy)</ref> मन्दिर के पृष्ठ भाग में स्थित प्राचीन मन्दिर के विषय में मान्यता है कि यह [[पार्वती]] जी का मन्दिर है। [[जवाहरलाल नेहरू]] ने सोमनाथ मन्दिर के पुनर्निर्माण के प्रस्ताव का ‘हिन्दू पुनरुत्थानवाद’ कहकर विरोध भी किया। उस समय नेहरू से हुई बहस को [[कन्हैयालाल मुंशी]] ने अपनी पुस्तक ‘पिलग्रिमेज टू फ़्रीडम’ में दर्ज किया है। वे लिखते हैं- : ''... कैबिनेट की बैठक के अन्त में जवाहरलाल ने मुझे बुलाकर कहा—मुझे सोमनाथ के पुनरुद्धार के लिए किया जा रहा आपका प्रयास पसन्द नहीं आ रहा। यह हिन्दू पुनरुत्थानवाद है। ‘मैंने जवाब दिया कि मैं घर जाकर, जो कुछ भी घटित हुआ है उसके बारे में आपको जानकारी दूँगा ...'' :''... दिसम्बर 1922 में मैं उस भग्न मन्दिर की तीर्थ यात्रा पर निकला। वहाँ पहुँचकर मैंने मन्दिर में भयंकर दुरवस्था देखी—अपवित्र, जला हुआ और ध्वस्त! पर फिर भी वह दृढ़ खड़ा था, मानो हमारे साथ की गई कृतघ्नता और अपमान को न भूलने का सन्देश दे रहा हो। उस दिन सुबह जब मैंने पवित्र सभामण्डप की ओर कदम बढ़ाए तो मन्दिर के खमृभों के भग्नावशेषों और बिखरे पत्थरों को देखकर मेरे अन्दर अपमान की कैसी अग्निशिखा प्रज्जवलित हो उठी थी, मैं बता नहीं सकता।'' के.एम. मुंशी आगे लिखते हैं- : ''नवम्बर 1947 के मध्य में सरदार प्रभास पाटन के दौरे पर थे जहाँ उन्होंने मन्दिर का दर्शन किया। एक सार्वजनिक सभा में सरदार ने घोषणा की: ‘नए साल के इस शुभ अवसर पर हमने फैसला किया है कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण करना चाहिए। सौराष्ट्र के लोगों को अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान देना होगा। यह एक पवित्र कार्य है जिसमें सभी को भाग लेना चाहिए।’ ...कुछ लोगों ने प्राचीन मंदिर के भग्नावशेषों को प्राचीन स्मारक के रूप में संजोकर रखने का सुझाव दिया जिन्हें मृत पत्थर जीवन्त स्वरूप की तुलना में अधिक प्राणवान लगते थे। लेकिन मेरा स्पष्ट मानना था कि सोमनाथ का मन्दिर कोई प्राचीन स्मारक नहीं, बल्कि प्रत्येक भारतीय के हृदय में स्थित पूजा स्थल था जिसका पुनर्निर्माण करने के लिए अखिल राष्ट्र प्रतिबद्ध था।''<ref>[https://www.panchjanya.com/Encyc/2020/8/3/Jai-Somnath-Jai-Shree-Ram-.amp.html जय सोमनाथ! जय श्रीराम! ]</ref>
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