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==<big>समय की प्रकृति</big> == हिंशन्दू व्यवस्था अनुसार ब्रह्माण्ड अनन्त काल तक समय चक्रो में विचरण करता है। 360 ऐसे दिन और रात ब्रह्म का एक वर्ष बनाते हैं। उनका जीवन ऐसे 100 वर्षों की अवधी का है।। प्रति मन्वन्तर के बीच लम्बी अवधि का अन्तराल होता है। इस अवधि में संसार का पुन:सृजन होता है और मनुष्य जनक रूप में नए मनु प्रकट होते हैं। इस समय हम सातवें मन्वन्तर में हैं जिसके मनु वैवस्वत मनु हैं। प्रति मन्वन्तर में 71 महायुग होते हैं। प्रत्येक महायुग चार युगों में विभक्त है-कृता, त्रेता, द्वापर और कलि। इनकी अवधि क्रमश्: 4800, 3600, 2400, 1200 देव वर्षों के बराबर है। हर युग में पवित्रता, नैतिकता, ’शौर्य्, क्षमता, जीवन अवधि तथा सुख का हाzस होता जाता है। इस समय हम कलियुग में हैं जों तत्वानुसार 3102 साल् पूर्व प्रारम्भ हुआ। यह साल् महाभारत के युद्ध का साल माना जाता है। कलियुग के अन्त के लक्षण माने गए हैं वर्णसंकरता, स्थापित मूल्यों का तिरस्कार, धार्मिक प्रथाओं की समाप्ति, क्रूर् एवं बाहरी राजाओं का राज। इसके तुरन्त बाद संसार का प्रलय एवं अग्नि से नाश होगा। सभी ग्रन्थो के अनुसार प्रलय कल्प के अन्तिम चक्र के बाद ही होता है। एक महायुग से दूसरे महायुग में परागमन सहजता से हो जाता है। जीवों का अन्त तीन प्रकार का माना गया है-नैमित्तिक, जो प्रति कल्प के अन्त में ब्रह्म् के दिन के अन्त में होता है। प्राकृतिक विनाश् ब्रह्म् के जीवन के अन्त में होता है। अत्यान्तिक-यह सम्पूर्ण तत्व मोक्ष की प्राप्ति है जहाँ से पुर्नजन्म के बन्धन से मुक्ति मिल जाती है।<br />
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