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=== शेरशाह के उत्तराधिकारी === शेरशाह की मृत्यु के बाद उसका योग्य एवं चरित्रवान पुत्र जलाल खाँ गद्दी पर बैठा, लेकिन अपने बड़े भाई आदिल खाँ के रहते सम्राट बनना स्वीकार नहीं किया था। उसने अमीरों व सरदारों के विशेष आग्रह पर राजपद ग्रहण किया। गद्दी पर बैठते ही अपना नाम इस्लामशाह धारण किया और उसने आठ वर्षों तक शासन किया। इस्लामशाह के समय विद्रोह और षड्यन्त्र का दौर चला। उनकी हत्या के लिए अनेक बार प्रयास किया गया, लेकिन इस्लामशाह ने धीरे-धीरे लगभग सभी पुराने विश्वासी सेनापतियों, हाकिमों व अधिकारियों आदि जो सन्देह के घेरे में आते गये उनकी हत्या करवा दी। सुल्तान के षड्यन्त्र में एकमात्र रिश्तेदार शाला को छोड़ा गया। मुगलों के आक्रमण के भय से (१५५२-५३ ई.) वह रोगशय्या से उठकर तीन हजार सैनिकों के साथ लड़ाई के लिए चल पड़ा। यह खबर पाकर मुगल सेना भाग खड़ी हुई। हुमायूँ के लौट जाने पर इस्लामशाह ग्वालियर (उपराजधानी) में लौट आया। अन्ततः १५५३ ई. में उसकी मृत्यु हो गई। इस्लामशाह के बाद उसका पुत्र फिरोजशाह गद्दी पर आसीन हुआ। उसके अभिषेक के दो दिन बाद ही उसके मामा मुवारिज खाँ ने उसकी हत्या कर दी और वह स्वयं मुहम्मद शाह आदिल नाम से गद्दी पर बैठ गया लेकिन आदिल के चचेरे भाई इब्राहिम खाँ सूर ने विद्रोह कर दिल्ली की गद्दी पर बैठा। इसके बाद उसका भाई सिकन्दर सूर दिल्ली का शासक बना। सूरवंशीय शासक के रूप में सिकन्दर सूर दिल्ली के शासक बनने के बाद उसे मुगलों (हुमायूँ) के आक्रमण का भय था। १५४५ ई. हुमायूँ ने ईरान शाह की सहायता से काबुल तथा कन्धार पर अधिकार कर लिया। १५५५ ई. में लाहौर को जीता। १५ मई १५५५ में मच्छीवाड़ा युद्ध में सम्पूर्ण पंजाब पर अधिकार कर लिया। २२ जून १५५५ के सरहिन्द युद्ध में अफगानों (सिकन्दर सूर) पर निर्णायक विजय प्राप्त कर हुमायूँ ने भारत के राजसिंहासन को प्राप्त किया तथा २३ जुलाई १५५५ को भारत का सम्राट बना लेकिन १५५६ ई. में उसकी मृत्यु हो गई। इससे पहले उसने १५ वर्षीय सूर वंश को समाप्त कर दिया।
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