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== सम्प्रदाय == '''{{मुख्य|जैन धर्म की शाखाएं}}''' तीर्थंकर महावीर के समय तक अविछिन्न रही जैन परंपरा ईसा की तीसरी सदी में दो भागों में विभक्त हो गयी : [[दिगम्बर|दिगंबर]] और श्वेताम्बर। मुनि प्रमाणसागर जी ने जैनों के इस विभाजन पर अपनी रचना 'जैनधर्म और दर्शन' में विस्तार से लिखा है कि आचार्य [[भद्रबाहु]] ने अपने ज्ञान के बल पर जान लिया था कि उत्तर भारत में १२ वर्ष का भयंकर अकाल पड़ने वाला है इसलिए उन्होंने सभी साधुओं को निर्देश दिया कि इस भयानक अकाल से बचने के लिए दक्षिण भारत की ओर विहार करना चाहिए। आचार्य भद्रबाहु के साथ हजारों जैन मुनि (निर्ग्रन्थ) दक्षिण की ओर वर्तमान के तमिलनाडु और कर्नाटक की ओर प्रस्थान कर गए और अपनी साधना में लगे रहे। परन्तु कुछ जैन साधु उत्तर भारत में ही रुक गए थे। अकाल के कारण यहाँ रुके हुए साधुओं का निर्वाह आगमानुरूप नहीं हो पा रहा था इसलिए उन्होंने अपनी कई क्रियाएँ शिथिल कर लीं, जैसे कटि वस्त्र धारण करना, ७ घरों से भिक्षा ग्रहण करना, १४ उपकरण साथ में रखना आदि। १२ वर्ष बाद दक्षिण से लौट कर आये साधुओं ने ये सब देखा तो उन्होंने यहाँ रह रहे साधुओं को समझाया कि आप लोग पुनः तीर्थंकर महावीर की परम्परा को अपना लें पर साधु राजी नहीं हुए और तब जैन धर्म में दिगंबर और श्वेताम्बर दो सम्प्रदाय बन गए। === दिगम्बर === [[चित्र:Shravanabelagola statue.jpg|right|thumb|250px|गोमतेश्वर की प्रतिमा ([[श्रवणबेलगोला]])]] [[दिगम्बर साधु]] (निर्ग्रन्थ) वस्त्र नहीं पहनते है, नग्न रहते हैं|दिगम्बर मत में तीर्थकरों की प्रतिमाएँ पूर्ण नग्न बनायी जाती हैं और उनका श्रृंगार नहीं किया है। दिगंबर समुदाय तीन में भागों विभक्त हैं। *[[तारणपंथ ]] *[[दिगंबर तेरापंथ|दिगम्बर तेरापन्थ]] *[[बीसपंथी|बीसपंथ]] === श्वेताम्बर === [[श्वेताम्बर]] एवं साध्वियाँ और संन्यासी श्वेत वस्त्र पहनते हैं, तीर्थकरों की प्रतिमाएँ प्रतिमा पर धातु की आंख, कुंडल सहित बनायी जाती हैं और उनका शृंगार किया जाता है। श्वेताम्बर भी दो भाग मे विभक्त है: # देरावासी - यॆ तीर्थकरों की प्रतिमाएँ की पूजा करतॆ हैं. # स्थानकवासी - ये मूर्ति पूजा नहीँ करते बल्कि साधु संतों को ही पूजते हैं। स्थानकवासी के भी दो भाग हैं:- #बाईस पंथी #[[श्वेताम्बर तेरापन्थ]]
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