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== परस्पर परिवर्तन == === शिक्षण और प्रेरण === माता अपने रक्त-मांस से उदरस्थ बालक के शरीर का निर्माण करती है। अपना श्वेत रक्त-दूध पिलाकर उसका पालन करती है, इसलिए इस उत्पादन में उसका श्रेय अधिक है। बालक माता के समीप ही अधिक रहता है, इसलिए उसके क्रिया-कलापों एवं भावनाओं से प्रेरणा भी अधिक लेता है, यह बात ठीक है, पर साथ ही यह भी निश्चित है कि अकेली माता उसका सर्वांगीण विकास कर सकने में समर्थ नहीं हो सकती। आहार, चिकित्सा, खेल, शिक्षा, संस्कार आदि का बहुत कुछ उत्तरदायित्व परिवार के अन्य लोगों पर भी समान रूप से है। इस परिवर्तन की क्रिया द्वारा घर के सभी लोग क्रमशः बालक को अपनी गोदी में लेते हैं और यह उत्तरदायित्व अनुभव करते हैं कि बालक के स्वस्थ विकास में सभी शक्ति पर योगदान करेंगे। वेशक माता के बाद अधिक उत्तरदायित्व पिता पर आता है, पर घर के अन्य सदस्य भी उससे मुक्त नहीं रह सकते। साझे की खेती की तरह बालकों के निर्माण में घर के सब लोगों का समान योगदान रहना चाहिए। === क्रिया और भावना === मन्त्रोच्चारण प्रारम्भ के साथ माता बालक को पहले उसके पिता की गोद में दे। पिता अन्य परिजनों को दे। शिशु एक-दूसरे के हाथ में जाता स्नेह-दुलार पाता हुआ पुनः माँ के पास पहुँच जाए। भावना की जाए कि बालक सबका स्नेह पात्र बन रहा है, सबके स्नेह-अनुदानों का अधिकार पा रहा है। <blockquote> '''ॐ अथ सुमंगल नामानह्वयति, बहुकार श्रेयस्कर भूयस्करेति। यऽएव वन्नामा भवति, कल्याण मेवैतन्मानुष्यै वाचो वदति॥''' </blockquote>
सारांश:
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