सामग्री पर जाएँ
मुख्य मेन्यू
मुख्य मेन्यू
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
मार्गदर्शन
मुखपृष्ठ
हाल में हुए बदलाव
बेतरतीब पृष्ठ
मीडियाविकि के बारे में सहायता
भारतपीडिया
खोजें
खोजें
दिखावट
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
व्यक्तिगत उपकरण
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
लॉग-आउट किए गए संपादकों के लिए पृष्ठ
अधिक जानें
योगदान
वार्ता
"
प्राचीन आर्य इतिहास का भौगोलिक आधार
" (अनुभाग) सम्पादित करें
पृष्ठ
चर्चा
हिन्दी
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
उपकरण
उपकरण
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
क्रियाएँ
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
सामान्य
कड़ियाँ
पृष्ठ से जुड़े बदलाव
विशेष पृष्ठ
पृष्ठ की जानकारी
दिखावट
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
चेतावनी:
आपने लॉग-इन नहीं किया हुआ है। अगर आप सम्पादन करते हैं तो इस पृष्ठ के सम्पादन इतिहास में आपका IP पता दृश्य होगा। अगर आप
लॉग-इन
करते हैं या
खाता बनाते हैं
तो दूसरी सुविधाओं के साथ-साथ आपके सम्पादनों का श्रेय आपके सदस्यनाम पर दिया जाएगा।
ऐन्टी-स्पैम जाँच। इसे
नहीं
भरें!
== सोमरस और सुर-असुर का विभेद == हमें मेरु पामीर को मानना हो चाहे थियानशान को, दोनों हालतों में हरिवर्ष यानी उत्तरकुरु को मानसरोवर के उत्तर होना मानना ही पड़ेगा। महाभारत, बौद्धसाहित्य, पुराण या रामायण-सबके अनुसार यह उत्तर-कुरु--जिसके मनुष्यों का वर्णन कुरु के निवासियों से यानी भारतीय आर्यों से कुछ विचित्र है और जो भारतीय आर्यों की प्रिय भूमि है, जिसका काल्पनिक स्मरण भी आज प्रत्येक आर्य को प्रफुल्लित किये देता है, जिसके आधार पर ही स्वर्ग की सारी कपना स्थित है--भारतवर्ष के उत्तर है। हिमालय आज भी आर्यसाहित्य की सृष्टि का प्रधान उत्तेजक है। यह कल्पना नहीं--पौराणिक-दन्तकथा नहीं--तथ्य है। हमारे सुर, हमारे इन्द्र, वरुण और कुबेर, यक्ष और गन्धर्व--सभी हिमालय के उत्तर हैं। मेरु के बाद हरिवर्ष, नैषध, किम्पुरुष, हेमकूट और भारतवर्ष की भूमि आर्यों की लीलाभूमि रही है। इसमें कवित्व नहीं, कोरा साहित्य नहीं, एक अचल ऐतिहासिक सत्य है। हम इस सिद्धान्त को तब और भी दृढ़ पाते हैं, जब हम सोमरस के इतिहास पर दृष्टिपात करते हैं। ऋग्वेद के सभी देवता सोमरस के मतवाले हैं; आर्यों के सभी यज्ञों में सोमरस की पग-पग पर आवश्यकता है। सोम-स्तुति पर ऋग्वेद का एक सम्पूर्ण मण्डल ही समर्पित है। अवेस्ता में भी इसका नाम है Haum, परन्तु इसकी वह महिमा नहीं, जो आर्यों के ऋग्वेद में है। अवेस्ता में सोमरस का पीनेवाला इन्द्र महज़ Demon हो जाता है और यहाँ इन्द्र आर्यों के एकमात्र उद्धारक बन जाते हैं। हमारे यहाँ सुरा की एक कथा प्रचलित है। यह सुरा सोमरस के सिवा और कुछ नहीं। पहले सुर और असुर दोनों आर्य ही थे; परन्तु जिन लोगों ने सुरा नहीं ग्रहण की, वे असुर और जिन्होंने ग्रहण की, वे सुर कहलाये। रामायण का यह श्लोक इसी प्रकार का है-<br /><br /> सुराप्रतिग्रहाद्देवाः सुरा इत्यभिविश्रुताः। अप्रतिग्रहणात् तस्या दैतेयाश्चासुरास्तथा॥<br /> हम ऊपर दिति और अदिति का ज़िक्र कर चुके हैं। ये दैत्य असुर कहलाये और ’आर्यानां व्रजः’ से, जो कश्यप-सागर (Caspian Sea) से पूर्व-उत्तर और दक्षिण की ओर फैला हुआ है, दोनों अलग-अलग हो गये। अस्तु, हमें यह देखना है कि आर्यों को सोमरस इतना प्रिय क्यों हुआ ? सोमरस से आविष्ट हो इन्द्र दैत्यों और असुरों को परास्त करते हैं। हिमालयोत्तर-प्रदेश में, जो स्वभावतः ठण्ढा रहा होगा और है, सोमरस का पीना अस्वाभाविक नहीं। सोमरस के पत्थरों से पीसे जाने का वर्णन ऋग्वेद में बहुलता से मिलता है। सोमलता हिमालय की तराई या हिमालयोत्तर-प्रदेश-- ख़ासकर काराकोरम के आसपास अब भी पायी जाती है। यह सोम भारतीय आर्यों की अपनी सम्पत्ति है। अहुरों (असुरों) का इससे कोई सम्बन्ध नहीं। अवश्य ही सुर-दल को पहाड़ी प्रदेशों में आने के कारण कठिनाइयां झेलनी पड़ी हैं; परन्तु सोम उनके प्राणों का आधार है। यह पदार्थ, यह रस हिमालयोत्तर प्रदेश का ही स्मरण कराता है।
सारांश:
भारतपीडिया पर किया कोई भी योगदान अन्य सदस्यों द्वारा बदला जा सकता है और हटाया भी जा सकता है। अगर आपको अपने लिखे हुए पाठ में संपादन होना नामंजूर है तो यहाँ पर न लिखें।
आप हमें यह भी वचन देतें हैं कि यह आपने स्वयं लिखा है अथवा सार्वजनिक क्षेत्र या किसी समान मुक्त स्रोत से प्रतिलिपित किया है (अधिक जानकारी के लिये
भारतपीडिया:कॉपीराइट
देखें)।
कॉपीराइट सुरक्षित कार्यों को बिना अनुमति के यहाँ न डालें!
रद्द करें
सम्पादन सहायता
(नए विंडो में खुलता है)