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== अभिगम ( सीखना ) और अभिप्रेरण == व्यक्ति के अन्तःकरण में अन्य अनेक विशेषताओं के साथ ही [[अभिप्रेरण]] (Motivation) भी विद्यमान रहता है। इसी कारण व्यक्ति को प्रेरणा मिलती रहती है। बिना किसी प्रेरणा से प्रेरित हुए व्यक्ति कोई कार्य नहीं करता। यदि कोई व्यक्ति अभिप्रेरित होकर किसी कार्य को कार्यान्चित करता है तो वह सदैव लक्ष्य तक पहुंचने का प्रयास करता है। अभिप्रेरण के माध्यम से सैनिकों में अपने लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु लगन, समर्पण की भावना व दृढता पैदा की जा सकती है। सीखने में अभिप्रेरण का महत्वपूर्ण स्थान है। शायद यही कारण है कि स्किनर महोदय अभिप्रेरण को " सीखने तक पहुंचने के लिये राजमार्ग " मानते हैं। अभिप्रेरण के दो पहलू होते हैं। लक्ष्य तक पहुंचने के लिये साधनों की भी आवश्यकता पड़ती है। अतः लक्ष्य और साधन का आपस में घनिष्ठ सम्बन्ध है। एक की अनुपस्थिति में दूसरे का कोई भी महत्व नहीं है। साधन के प्राप्त होने पर लक्ष्य तक पहुंचना सरल हो जाता है। लेकिन साधन ही लक्ष्य तक पहुंचने का एक मात्र मार्ग नहीं है। इस हेतु अभिप्रेरण भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। लक्ष्य व्यक्ति को अभिप्रेरित करता है। अनेक छोटे-छोटे लक्ष्य मिलकर बड़े लक्ष्य की पूर्ति हेतु व्यक्ति की अभिप्रेरित करते हैं। इस प्रकार एक “ साधन-प्रेरणा ' और एक ' लक्ष्य-प्रेरणा पैदा हो जाती है। ' साधन प्रेरणा के परिणामस्वरूप लक्ष्य प्रेरणा विकसित होती है। लक्ष्य अभिप्रेरण की अनुपस्थिति में साधन अभिप्रेरण महत्वहीन होता है। ===अभिप्रेरण के प्रकार === प्रेरणा को हम दो रूपों में देखते हैं ( अ ) स्वाभाविक अभिप्रेरण ( ब ) कृत्रिम अभिप्रेरण। ==== स्वाभाविक अभिप्रेरण ==== इसके अन्तर्गत प्रकृति प्रदत्त अभिप्रेरण समाहित किये जाते हैं। ये अधोलिखित प्रकार के होते हैं- ( 1 ) मूल प्रवृत्ति। ( 2 ) सहज क्रियायें। ( 3 ) अनुकरण। ( 4 ) आदत। ( 5 ) आकांक्षा। ( 6 ) भूख एवं प्यास। ( 7 ) आत्म प्रतिष्ठा, तथा ( 8 ) रुचि। '''( 1 ) मूल-प्रवृत्ति -''' कुछ अभिप्रेरण जन्मजात होते हैं। इस प्रकार के अभिप्रेरण व्यक्ति को वातावरण की परिस्थितियों के अनुसार विशेष क्रियाओं को करने के लिये बाध्य करते हैं। इन अभिप्रेरणों का उददेश्य शारीरिक एवं मानसिक इच्छा की सन्तुष्टि होती है। सुख-दुःख, आनन्द-कष्ट अथवा रसानुभूतियाँ जैसे अभिप्रेरण व्यक्ति को प्रकृति-प्रदत्त होते हैं। इनके लिये व्यक्ति को अभिप्रेरित नहीं होना पड़ता। इस क्षेत्र में वे स्वयं अभिप्रेरित रहते हैं। जैसे एक व्यक्ति दूसरे को दुःखी देखकर स्वयं दुःख का अनुभव करने लगता है। सैनिकों मे चरित्र-निर्माण का गुण विकसित करने में इस अभिप्रेरण का प्रयोग किया जा सकता है। '''( 2 ) सहज क्रियायें -''' स्वचालित सहज क्रियायें भी प्रकृति-प्रदत्त होती हैं। ये क्रियायें सदैव चलती रहती हैं यथा श्वास लेना, पलक गिरना, नाड़ी संस्थान एवं स्नायु संस्थान आदि की क्रियायें। अभिप्रेरण से इनका बहुत सम्बन्ध है फिर भी इनकी आवश्यकता तब पड़ती है जबकि हमें व्यक्ति के व्यक्तित्व के विषय में भिन्न-भिन्न अंगों से ज्ञानार्जन की आवश्यकता होती है। इस ज्ञानार्जन से यह लाभ होता है कि इसके अनुसार व्यक्ति को अभिप्रेरण प्रदत्त करने वाली युक्तियों का निर्माण किया जा सके। व्यक्ति के अन्दर स्थित ग्रन्थियों में आवश्यक परिवर्तन लाकर उन्हें अभिप्रेरण के निर्मित होने में सहायक बनाया जा सकता है। सैनिकों को प्रदत्त अन्धकार में देखने का प्रशिक्षण, दूरी अनुमापन का पशिक्षण, ध्वनियों को सुनने व समझने का प्रशिक्षण आदि की दृष्टि से इस अभिप्रेरण का प्रयोग किया जा सकता है। '''( 3 ) अनुकरण -''' व्यक्ति में अनुकरण की प्राकृतिक क्षमता होती है। मूल प्रकृति और अनुकरण में यह अन्तर होता है कि मूल-प्रकृति मे कल्पना-शक्ति का समावेश नहीं होता जबकि अनुकरण में व्यक्ति अपनी कल्पना का भी प्रयोग करता है। अनुकरण द्वारा कार्य करने पर सफलता मिलने पर वह उसी कार्य को पुनः करने के लिये अभिप्रेरित होता है। अनुकरण के लिये यदि उचित निर्देश मिले तो सैनिकों को कार्य-विशेष के लिये अभिप्रेरित किया जा सकता है। इस हेतु उचित उदाहरण की आवश्यकता होती है। परमवीर चक्र . महावीर चक्र व वीर चक्र से विभूषित रण बांकुरों का उदाहरण उनके सामने आदर्श के रूप में रखा जा सकता है। इन उदाहरणों का अनुकरण करके सैनिक उस ओर अभिप्रेरित हो जाते हैं। यही अभिप्रेरित कार्य बार-बार दुहराये जाने पर आदत से सम्बद्ध हो जाते हैं। '''( 4 ) आदत -''' अनुकरण के सिद्धान्त में ग्रन्थि-परिवर्तन की अपेक्षा आदत का सिद्धान्त अधिक लाभदायक सिद्ध होता है। प्रारम्भ में पड़ी आदतें व्यक्ति को जीवन भर प्रभावित करती रहती हैं। अतः प्रशिक्षण-अवधि में सैनिकों में इस प्रकार आदतें विकसित करने का प्रयास होना चाहिये, जिससे वे एक कुशल सैनिक के साथ ही साथ कुशल नागरिक भी बन सके। '''( 5 ) आकांक्षा -''' व्यक्ति की अपनी अलग-अलग आकांक्षायें एवं अभिलाषायें होती हैं। इन अभिप्रेरणाओं को अभिप्रेरित करके इन्हें महान लक्ष्य तक पहुंचाया जा सकता है। जैसे खेल में रुचि रखने वाले सैनिक को अभिप्रेरित करके उसे एक सफल खिलाड़ी की कोटि तक पहुंचाया जा सकता है। '''( 6 ) भूख एवं प्यास -''' व्यक्ति के भीतर से प्रेरणायें स्वयं जागृत होती हैं व भोजन तथा पानी मिलने पर इनका शमन हो जाता है। इसी प्रकार अभिप्रेरित करके उनके भीतर सत्कार्य व साहसिक कार्य की भूख भी पैदा की जा सकती है। '''( 7 ) आत्म-प्रतिष्ठा-''' प्रत्येक व्यक्त्ति अथवा सैनिक अपनी आत्म-प्रतिष्ठा व आत्म-गौरव को उन्नत देखना चाहता है। आत्म-प्रतिष्ठा की भूख बहुत प्रबल होती है। इसे प्राप्त करने के लिये व्यक्ति कठिन से कठिन कार्य करने को उद्यत हो जाता है। आत्म-प्रतिष्ठा द्वारा अभिप्रेरित व्यक्ति कार्य को बहुत लगन के साथ पूरा करता है तथा सदैव उस पर लक्ष्य तक पहुंचने की धुन सवार रहती है। आत्म-सम्मान के लिये ही व्यक्ति सत्कार्य करता है। आत्म-प्रकाशन के अभाव में आत्महीनता का विकास होता है। अतः सैनिकों में आत्म-सम्मान की भावना जागृत करने का सतत प्रयास किया जाना चाहिये। '''( 8 ) रुचि -''' विभिन्न व्यक्तियों की रुचियों में भिन्नता पायी जाती है। आवश्यकता पड़ने पर उद्देश्य-विशेष की प्राप्ति हेतु अभिप्रेरण द्वारा व्यक्ति में रुचि उत्पन्न भी करायी जानी चाहिये। क्योंकि एक बार रुचि उत्पन्न हो जाने के पश्चात्, सम्बन्धित व्यक्ति स्व-रुचि के कार्य को स्वयं ही करता चला जाता है। ==== कृत्रिम अभिप्रेरण ==== स्वाभाविक अभिप्रेरण, कृत्रिम अभिप्रेरण के साधन स्वरूप है। कृत्रिम अभिप्रेरण के द्वारा ही व्यक्ति / बालकों की अनुचित अभिप्रेरणाओं को बदलकर उन्हें सही आकार दिया जाता है लेकिन दोनों ही एक दूसरे पर आधारित है। स्वाभाविक अभिप्रेरण को चरम सीमा तक पहुंचाने के लिए कृत्रिम अभिप्रेरण की सहायता ली जाती है। ये कृत्रिम अभिप्रेरण निम्नवत् हैं- 1. पुरस्कार एवं दण्ड 2. प्रगति एवं फल का ज्ञान 3. प्रशंसा और भर्त्सना 4. अभिप्रेरण एवं परिपक्वता 5. लक्ष्य एवं लक्षित प्रयत्न 6. प्रभाव के नियम 7. लगन के साथ कार्यान्वयन 8. वैयक्तिक तथा सामूहिक अभिप्रेरण, तथा 9. अवसर प्राप्ति। '''( 1 ) पुरस्कार एवं दण्ड अभिप्रेरण —''' यह अभिप्रेरण सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। पुरस्कार अभिप्रेरण सदैव दण्ड-अभिप्रेरण की अपेक्षा श्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि यह एक प्रत्यक्ष प्रेरणा के रूप में होता है। स्किनर महोदय ने पुरस्कार एवं दण्ड के गुण व दोषों पर अधोलिखित रूप में अपना विचार व्यक्त किया है '''पुरस्कार के गुण -''' -आनन्ददायक होने के कारण पुरस्कार सम्बन्धित कार्य को बार-बार करने के लिये प्रोत्साहित करता है। -पुरस्कार में व्यक्ति को प्रेरित करने की शक्ति होती है। -आनन्ददायक होने के कारण पुरस्कार से रुचि एवं उत्साह मिलता है। -पुरस्कार से व्यक्ति को उच्च मनोबल प्राप्त होता है, क्योंकि इससे व्यक्ति के आत्म-सम्मान एवं अहं की तुष्टि होती है। '''दोष -''' -पुरस्कार का स्वरूप बहिरंग होता है, क्योंकि वे व्यक्ति को वस्तु के प्रति रुचि पैदा करने के स्थान पर मात्र पुरस्कार जीतने के लिये उत्साह प्रदान करते हैं -पुरस्कार से धोखा देने के लिये भी प्रोत्साहन मिलता है। -पुरस्कार से एक अनुचित अभिवृत्ति को भी प्रोत्साहन मिलता है अर्थात् बिना मूल्य कुछ प्राप्त करने की आशा। -जो लोग पुरस्कार जीतने की आशा कर सकते हैं उन्हें अभिप्रेरण की सबसे कम आवश्यकता पड़ती है। '''दण्ड के गुण -''' - दण्ड अक्सर व्यक्ति को अवांछित काम से मोड़ते हैं। -दण्ड अनुशासन का एक रूप होता है। -दण्ड उस समय विशेष उपयोगी होता है, जब- ( 1 ) वे अवांछित काम का स्वाभाविक परिणाम प्रतीत होते हैं। ( 2 ) पुरस्कार के साथ-साथ प्रयुक्त किये जाते हैं, तथा ( 3 ) जब दण्ड पाने वाले को यह विश्वास हो जाता है कि उसे नहीं वरन उसके अवांछित कार्यों को दण्डित किया जा रहा है। '''दोष -''' -दण्ड प्रायः भय पर आधारित होते हैं। -यदि दण्ड का भय छोड़ दिया जाये या सम्बन्धित उसे झेलने के लिये तैयार हो जाये तो इसका अस्तित्व मिट जाता है। -अवांछित काम की ओर बार-बार ध्यानाकर्षण के परिणामस्वरूप उस काम को और भी उत्साह मिल सकता है। -दण्ड से सदैव अप्रिय एवं दुःखद अनुभूति होती है, जो नकारात्मक होती है और असफलता का कारण भी हो सकती है। -दण्ड के परिणाम सदैव स्थायी नहीं होते। -दण्ड के प्रयोग से समाज व दण्ड देने वाले के प्रति बुरी भावनायें पैदा हो सकती हैं। -दण्ड की कठोरता का कोई माप नहीं है। एक ही दण्ड एक के लिये कठोर हो सकता है लेकिन दूसरे के लिये सरल। इस प्रकार पुरस्कार और दण्ड अभिप्रेरण के अन्दर गुण व दोष दोनों ही समाहित होते है। '''( 2 ) प्रगति एवं फल का ज्ञान -''' समय-समय पर प्रगति की सूचना मिलते रहने से व्यक्ति में अभिप्रेरण और तीव्र हो जाता है। इससे उत्साह और लगन में भी वृद्धि होती है जिसका प्रभाव व्यक्ति के मनोबल और सफलता की मनोवृत्ति पर पड़ता है। '''( 3 ) प्रशंसा और भर्त्सना -''' व्यक्ति के ऊपर जो प्रभाव पुरस्कार और दण्ड का पड़ता है वही प्रभाव उस पर प्रशंसा एवं भर्त्सना का भी पड़ता है। लेकिन, अन्तर केवल इतना ही होता है कि पुरस्कार और दण्ड-जनित अभिप्रेरण अधिक तीव्र होता है, जबकि प्रशंसा और भर्त्सना-जनित अभिप्रेरण उतना तीव्र नहीं होता। प्रशंसा से भर्त्सना की अपेक्षा अधिक उचित अभिप्रेरण पैदा होता है। '''( 4 ) अभिप्रेरण एवं परिपक्वता-''' अभिप्रेरण का कार्य उचित समय एवं स्थिति में किया जाना चाहिये। अभिप्रेरण का कार्य उसी अवस्था में किया जाना चाहिये जब सम्बन्धित व्यक्ति मानसिक, शारीरिक व वातावरणिक दृष्टि से अभिप्रेरण को स्वीकार करने के लिए तैयार हो। '''( 5 ) लक्ष्य एवं लक्षित प्रयत्न -''' उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए अभिप्रेरण किया जाना चाहिये। लक्ष्य यदि आकर्षक, स्पष्ट और आनन्ददायक है तो उत्पन्न की गई अभिप्रेरणा अधिक तीव्र होगी। व्यक्ति लक्ष्य की ओर जिस लगन से आकर्षित होता है, उसी के अनुपात में उसमें प्रेरणा भी जागृत होती है, अतः प्रेरणा लक्ष्य के समानुपाती होती है। लक्ष्य की प्राप्ति के लिये यह भी आवश्यक होता है कि उसी के अनुसार कार्य अथवा प्रयत्न भी निरन्तर जारी रहे। बस निरन्तरता में व्यवधान न पैदा हो, इसका सदैव प्रयत्न किया जाना चाहिये। '''( 6 ) प्रभाव के नियम -''' व्यक्ति का एक उद्देश्य आनन्द की प्राप्ति भी होता है। इस सिद्धान्त पर आधारित प्रभाव का नियम प्रेरणा के क्षेत्र में सफल भूमिका या निर्वहन करता है। प्रत्येक कार्य सुख अथवा दुख का सृजक होता है। स्वभावतः व्यक्ति उन्हीं लक्ष्यों को चुनना पसन्द करता है जो आनन्ददायक होते हैं। प्रगति और फल ज्ञान के सिद्धान्त में इस नियम का प्रभाव पड़ता है। सन्तोषजनक प्रगति होने पर व्यक्ति उत्साहित और असन्तोषजनक प्रगति होने पर वह हतोत्साहित होता '''( 7 ) लगन के साथ कार्यान्वयन -''' प्रेरणा के वशीभूत होकर किये जाने वाले कार्य से समूचे व्यक्तित्व को सन्तुष्टि प्राप्त होती है। कभी-कभी इससे प्रत्यक्ष निषेध का अभिप्रेरण भी व्यक्तित्व में प्रवेश कर जाता है जिससे व्यक्ति में असामाजिकता और स्वार्थपरता की भावना जन्म लेने लगती है। इन प्रेरणाओं के प्रति सचेत रहने की आवश्यकता होती है। व्यक्ति के भीतर कुछ ऐसी भी प्रेरणायें होती हैं जो उदासीन-सी पड़ी रहती है। इन अभिप्रेरणाओं को पहचान कर इन्हें प्रोत्साहित करना चाहिये। ऐसा करने से ये प्रेरणायें चैतन्यावस्था में आ जाती है और कार्य में पुनः प्रगति होने लगती है। '''( 8 ) वैयक्तिक तथा सामूहिक अभिप्रेरण -''' इस सिद्धान्त का आधार पुरस्कार प्राप्ति की लालसा होती है। पुरस्कार के द्वारा प्रतियोगिता और प्रतिद्वन्द्विता की उत्पत्ति होती है। प्रतियोगितायें अक्सर समूह में ही सम्पन्न होती है। यह बहुत उद्देश्यात्मक एवं अनुपूरक कामों को सहकारिता के स्तर पर करने के लिये प्रोत्साहन प्रदान करती है। ऐसे कार्यों से व्यक्ति का मनोबल विकसित होता है। प्रतियोगिता एवं प्रतिद्वन्द्विता की भावना उत्पन्न करके लोगों में सामाजिक मनोवृत्ति का विकास भी किया जा सकता है। लेकिन यदि थोड़ी-सी भी असावधानी बरती गई तो लोग एक दूसरे के प्रति ईर्ष्या व घृणा भी करने लगेंगे। अतः इसके प्रयोग में सावधानी बरती जानी चाहिये। सामूहिकता के महत्व पर बल देते हुए ए ० आई ० गेट्स महोदय ने कहा है “ पृथक रूप में सीखने के बजाय समूहों में सीखना अधिक श्रेष्ठ प्रतीत होता है-जब समूह के सभी सदस्य अध्ययन की गई समस्या में रुचि लेते हैं तब समूह की गतिशीलता अधिक प्रभावकारी होती है, जहाँ सदस्यों के प्रयोजनों में परस्पर बहुत अन्तर होता है वहाँ समूह की गतिशीलता पर प्रतिकूल असर पड़ता है, जब बच्चे किसी ऐसे समूह में काम करते हैं, जिसमें नेतृत्व लोकतन्त्रीय होता है तब वे अधिक सहयोग करते हैं, अधिक अभिक्रमशीलता प्रदर्शित करते हैं, कम झगड़ते हैं और आपस में कम संघर्ष और विद्वेष प्रकट करते हैं। समूह गतिशीलता सामाजिक कौशलों के विकास के लिये, जो कि लोकतन्त्रीय रहन-सहन, बेहतर सामाजिक सौहार्द और समूह के सदस्य को लोकतन्त्रीय नागरिकता के लिये तैयार करने हेतु अनिवार्य है, सर्वोत्तम उपलब्ध साधन है। '''( 9 ) अवसर-प्राप्ति-''' व्यक्ति के भीतर निहित छोटी से छोटी अभिप्रेरणा को भी प्रोत्साहन प्रदान करना चाहिये तथा उन्हें विकसित होने का पूरा-पूरा अवसर दिया जाना चाहिये। क्योंकि यही छोटी-छोटी अभिप्रेरणायें आगे चलकर महत्वपूर्ण प्रेरणाओं का रूप धारण करती है। सीखने में प्रेरणा की भूमिका को स्पष्ट करते हुए '''केली''' महोदय ने कहा है- " सीखने की प्रक्रिया की कुशल और सुचारू व्यवस्था में अभिप्रेरण केन्द्रीय कारक है। सभी सीखने में किसी न किसी प्रकार का अभिप्रेरण अवश्य होना चाहिये। "
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