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== वेद की शाखाएँ == '''{{मुख्य|वैदिक शाखाएँ}}''' इसके अनुसार वेदोक्त यज्ञों का अनुष्ठान ही वेद के शब्दों का मुख्य उपयोग माना गया है। सृष्टि के आरम्भ से ही यज्ञ करने में साधारणतया मन्त्रोच्चारण की शैली, मन्त्राक्षर एवं कर्म-विधि में विविधता रही है। इस विविधता के कारण ही वेदों की शाखाओं का विस्तार हुआ है। यथा-[[ऋग्वेद]] की २१ शाखा, [[यजुर्वेद]] की १०१ शाखा, [[सामवेद संहिता|सामवेद]] की १००० शाखा और [[अथर्ववेद संहिता|अथर्ववेद]] की ९ शाखा- इस प्रकार कुल १,१३१ शाखाएँ हैं। इस संख्या का उल्लेख महर्षि [[पतञ्जलि|पतंजलि]] ने अपने [[महाभाष्य]] में भी किया है। उपर्युक्त १,१३१ शाखाओं में से वर्तमान में केवल १२ शाखाएँ ही मूल ग्रन्थों में उपलब्ध हैः- # ऋग्वेद की २१ शाखाओं में से केवल २ शाखाओं के ही ग्रन्थ प्राप्त हैं- '''शाकल-शाखा''' और '''शांखायन शाखा'''। # यजुर्वेद में कृष्णयजुर्वेद की ८६ शाखाओं में से केवल ४ शाखाओं के ग्रन्थ ही प्राप्त है- '''तैत्तिरीय-शाखा''', '''मैत्रायणीय शाखा''', '''कठ-शाखा''' और '''कपिष्ठल-शाखा''' # शुक्लयजुर्वेद की १५ शाखाओं में से केवल २ शाखाओं के ग्रन्थ ही प्राप्त है- '''माध्यन्दिनीय-शाखा''' और '''काण्व-शाखा'''। # सामवेद की १,००० शाखाओं में से केवल २ शाखाओं के ही ग्रन्थ प्राप्त है- '''कौथुम-शाखा''' और '''जैमिनीय-शाखा'''। # अथर्ववेद की ९ शाखाओं में से केवल २ शाखाओं के ही ग्रन्थ प्राप्त हैं- '''शौनक-शाखा''' और '''पैप्पलाद-शाखा'''। उपर्युक्त १२ शाखाओं में से केवल ६ शाखाओं की अध्ययन-शैली प्राप्त है-शाकल, तैत्तरीय, माध्यन्दिनी, काण्व, कौथुम तथा शौनक शाखा। यह कहना भी अनुपयुक्त नहीं होगा कि अन्य शाखाओं के कुछ और भी ग्रन्थ उपलब्ध हैं, किन्तु उनसे शाखा का पूरा परिचय नहीं मिल सकता एवं बहुत-सी शाखाओं के तो नाम भी उपलब्ध नहीं हैं।
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