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==अनुवाद की विभिन्न विचारधाराएँ== अनुवाद की प्रचलित विचार धाराएँ कुछ प्रमुख सैद्धांतिक मूल्यों के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गई हैं। इन में से कुछ सिद्धान्त अधिक चर्चा का विषय रहे हैं। ===समतुल्यता का सिद्धांत=== सन १९५० से १९६० के बीच अनुवाद अध्ययन में चर्चा बस यहीं तक सीमित थी की दो भाषाओं के बीच समतुल्यता कैसे स्थापित की जाए। 'समतुल्य' शब्द के दो अर्थ हैं। रूसी परंपरा के अनुसार समतुल्यत का अर्थ है द्वि-भषाई शब्दों के अर्थ का समरूपी होना। वहीं फ्रेंच परंपरा में विनय एवं डॉर्ब्लनेट के अनुसार सम्तुल्यता का अर्थ है द्वि-भाषाई शब्दों के बीच एक ही कार्यात्मक प्रभाव होना। फ़्रेंच परंपरा के अंतर्गत यदि भाषाओं के प्रारूप में यदि कोइ भिन्नता भी आ जाए, तो भी कोई बड़ी बात नहीं हो जाती है। ===वर्णनात्मक अनुवाद अध्ययन=== 'वर्णनात्मक अनुवाद अध्ययन' नामक व्याक्यांश टूरी द्वारा रचित पुस्तक, 'डिस्क्रिप्टिव ट्रांस्लेशन स्ट्डीज़ एण्ड बियॉण्ड' से लिया गया है। इस अध्ययन का लक्ष्य एक आनुभविक वर्णनात्मक विधा को विकसित करना है जो हॉल्म्स द्वारा दिये गये नक्षे के एक पहलू को पूरा कर सके। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में रूसी रूपवादों ने इस विचार की संरक्षणा करी की वैज्ञानिक कार्य-प्रणाली भी सांस्क्रितिक गतिविधियों पर लागू हो सकती है। यही विचार धारा अब साहित्यिक अनुवादों पर भी लागू होने लगी। इस विचार धारा का अग्रिम रूप इवैन-ज़ोहार द्वारा सन १९९० में दी गयी 'बहु-प्रणाली' के सिद्धांत में देखी गयी। इस सिद्धांत के अन्तर्गत अनुवादित साहित्य, प्रायोजित साहित्यिक प्रणाली के उप-तंत्र के रूप में देखा जाता है। गिडन-टूरी ने अपने सिद्धांत का आधार भी इस विचार धारा को बनाया की अनुसन्धान हेतु अनुवाद को <nowiki>''</nowiki>प्रायोजित सन्स्क्रिति के तथ्यों के रूप में देखा जाए"। साहित्यिक अनुवादों के तहत ही 'छलयोजना' व 'संरक्षण' जैसे सिद्धान्तों को विकसित किया गया। ===स्कोपोस का सिद्धान्त=== अनुवाद के सिद्धान्त में एक अनोखा परिवर्तन यूरोप मेंसन १९८४ मेइन हुआ। उस वर्ष जर्मन भाषा में दो पुस्तकों का प्रकाशन हुआ: कैथरीना रेइज़ व हैंस फ़ेमीर द्वारा लिखित, 'फाउण्डेशन फॉर अ जनरल थ्योरी ऑफ ट्रांस्लेशन', एवं जस्टा-हॉल्ज़-मंटारी द्वारा रचित, 'ट्रांसलेटोरियल एक्शन' का। इन दोनों किताबों के ज़रिये ही 'स्कोपोस' के सिद्धान्त की रचना हुई - जो समतुल्य्ता के सिद्धान्त से कई अधिक तवज्जो अनुवाद के उद्देश्य को देती है। ===सांस्कृतिक अनुवाद=== अनुवाद की विधा के विकास में सांस्कृतिक अनुवाद ने बड़ा योगदान किया। इस सिद्धान्त का चित्रण सूसन बैस्नेट व एण्ड्र्यु लेफ़ेवर ने अपनी पुस्तक,'ट्रांस्लेशन-हिस्ट्री-कल्चर' में किया। सांस्कृतिक अनुवाद के सिद्धान्त की उत्पत्ति होमी के भाभा की पुस्तक, 'द लोकेशन ऑफ कल्चर' से हुई है। सांस्कृतिक अनुवाद का सिद्धान्त बदलाव की प्रक्रिया पर प्रकाश डालती है (भाषा या अन्य) जो एक विशिष्ट सांस्कृतिक वातावरण में पनपती है। यह सिद्धांत भाषाई अनुवादों के ज़रिये इन सांस्कृतिक बदलावों को समझने की चेष्टा करती है। ===अनुवाद के क्षेत्र में निरीक्षण=== अनुवाद का इतिहास - अनुवादकों के इतिहास व अनुवाद के इतिहास दोनों से सरोकार रखता है। अनुवाद का इतिहास किसी संस्कृति की उत्पत्ति, विकास व पतन को समझने का एक बेजोड तरीका है। अनुवाद के इतिहास को समझने हेतु कुछ सिद्धान्त पिम व लिवेन डी'ह्ल्ट्ज़ ने साझा की। ===अनुवाद एक सामाज-शास्त्र के रूप में=== एक सामाजिक शास्त्र के रूप में अनुवाद अध्ययन अनुवादक, उनके कार्यस्थल एवं इन से मिलने वाले तथ्यों से विभिन्न भाषाओं के बीच विचारों के आदान-प्रदान का अध्ययन करती है। ===उत्त्तर उपनिवेशवाद एवं अनुवाद अध्ययन=== उत्तर उपनिवेशवाद अध्ययन भूतपूर्व उपनिवेशों में होने वाले अनुवादों का अध्ययन करती है। यह विषय इस सोच की गहन जाँच करती है, जिस के अन्तर्गत यह माना जाता है की दो भिन्न भाषओं और संस्कृतियों के बीच ही अनुवाद सम्भव है। ===लैंगिक अध्ययन=== लैंगिक अध्ययन में मूलतः अनुवादक के लिंग एवं ग्रंथों के लैंगिक स्वरूप की चर्चा की जाती है। लैंगिक अध्ययन, लैंगिक अलंकारो के प्रयोग की पड़ताल करती है, जिसके द्वारा अनुवाद की क्रिया का वर्णन करा जाता है। इस क्षेत्र में शेरि साइमन, कीथ हार्वे व लूइ वॉन फ्लोटो ने काफी योगदान दिया है। ===नीति शास्त्र=== नीति शास्त्र और अनुवाद के क्षेत्र के विकास का श्रेय एन्टोनि बेर्मेन व लॉरेंस वेनुटी को जाता है। इन्न दोनो के निबन्धों में मूल बात है दो संस्कृतियों की भिन्नत्ता एव्ं उस संस्कृति की भिन्नत्ता जिस में की अनुवाद हो रहा है। दोनो इसी बात पर ज़ोर देते हैं की अनुवाद कि प्रक्रिया में सांस्कृतिक भिन्नताओं का संरक्षण किया जा सके। नवीनतम अध्ययन प्रखर पण्डित इमेनुअल लेविनॉस के आत्म्वाद व नीति-शास्त्र के सिद्धान्तों पर मनन करती है। कुछ विद्वान इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं की अनुवाद एक नीति-बद्ध कार्य नहीं है, जबकी कई विद्वानों का मानना यह है की लेखक और अनुवादक का रिश्ता आपसी मेल-जोल का है, जिस से यह प्रक्रिया पारस्परिक व बराबरी की हो चली है। इन सभी अध्ययनों के सामानांतर अब अनुवादकों की ज़िम्मेदारी का आभास सब को हो चला है। अनुवादकों को अब भू-राजनीतिक मामलों में सक्रिय प्रतिभागियों के रूप में देखा जाने लगा है। इस बात से हम इस नतीजे पर पहुँचते हैं क़ि अनुवाद मात्र एक भाषा-संबंधी गतिविधि नहीं है, अपितु एक सामाजिक व राजनीतिक प्रक्रिया है।
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