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== अपील के प्रकार == अपील सामान्यत: दो प्रकार की होती है---प्रथम अपील या द्वितीय। कतिपय वादों में तृतीय अपील भी हो सकती है। प्रथम अपील आरंभिक न्यायालय के निर्णाय के संबंध में उच्चतर न्यायालय में होती है। द्वितीय अपील--अपील न्यायालय के निर्णय के संबंध में श्रेष्ठतम अधिकारी के समक्ष होती है। === व्यवहार अपील === व्यवहार वादों में न्यायालय के समस्त आदेश दो भागों में विभाजित होते हैं--'आज्ञप्ति' तथा आदेश'। आज्ञप्ति से तात्पर्य उस अभिनिर्णयन से है जिसके द्वारा, जहाँ तक अभिनिर्णयन देनेवाले न्यायालय का संबंध है, वाद या वादानुरूप अन्य आरंभिक कार्रवाई में निहित विवादग्रस्त सब या किसी एक विषय के संबंध में, विभिझ पक्षों के अधिकारों का अंतिम रूप से निवारण होता है (धारा 2 (2) व्यवहार-प्रक्रिया-संहिता)। आदेश से तात्पर्य व्यवहार न्यायालय के ऐसे प्रत्येक विनिश्चय से है जाए आज्ञप्ति की श्रेणी में नहीं आता (धारा 2 (14), व्यवहार-प्रक्रिया-संहिता)। आदेश के विरूद्ध केवल एक अपील हो सकती है। प्रथम अपील व्यवहार-प्रक्रिया-संहिता की धारा 96 के अंतर्गत किसी आज्ञप्ति के विरुद्ध बाद के मूल्यानुसार उच्च न्यायालय या जिला न्यायधीश के समक्ष होती है। प्रथम अपील में तथ्य तथा विधि के सभी प्रश्नों पर विचार हो सकता है। प्रथम अपील न्यायालय को परीक्षण न्यायालय की समस्त शक्तियाँ प्राप्त हैं। द्वितीय अपील, व्यवहार--प्रक्रिया--संहिता की जारा 100 के अंतर्गत व्यवहारवादों में आज्ञप्ति के विरुद्ध केवल विधि संबंधी प्रश्नों पर, न कि तथ्य के प्रश्न पर, उच्च न्यायालय में होती है। जब द्वितीय अपील की सुनवाई उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश द्वारा होती है तब यह न्यायाधीश 'लेटर्स पेटेंट' या उच्च न्यायालय विधानीय अधिनियम के अंतर्गत, उसी न्यायालय के दो न्यायधीशों के खंड के समक्ष एक और अपील की अनुमति दे सकता है। === दंड अपील === दंड अपील संबधी विधि दंड--प्रक्रिया--संहिता की धारा 404 से लेकर 431 तक में दी हुई है। दंड संबंधी वादों में केवल एक अपील हो सकती है। इसका एक ही अपवाद है। जब अपील न्यायालय अभियुक्त को निमुक्त कर देता है तब दंड-प्रक्रिया-संहिता की धारा 417 के अंतर्गत विमुक्ति आदेश के विरुद्ध द्वितीय अपील उच्च न्यायालय में हो सकती है। जब जिलाधीश के अतिरिक्त कोई अन्य दंडनायक दंड--प्रक्रिया--संहिता की धरा 122 के अंतर्गत किसी वाद को स्वीकार या विमुक्त करना अस्वीकार कर दे तब उसके आदेश के विरुद्ध अपील जिलाधीश के समक्ष हो सकती है (धारा 406 (अ) दंड-प्रक्रिया-संहिता)। उत्तर प्रदेश राज्य ने जिलाधीश के समक्ष होनेवाली इस अपील का भी उन्मूलन कर दिया है और अपील जिलाधीश के समक्ष न होकर सत्रन्यायालय में होती है। ऐसे मामलों को छोड़कर, जिनमें परीक्षण न्यायालय द्वारा होता है, दंड अपील तथ्य तथा विधि, दोनों प्रश्नों पर हो सकती है। मृत्यु-दंड-प्राप्त व्यक्ति के साथ परीक्षित व्यक्ति की ओर से की जानेवाली अपीलों को छोड़कर, न्यायसभ्य द्वारा परीक्षित समस्त वादों की अपील केवल विधि विषयक प्रश्नों कें संबंध में ही हो सकती है। अपील-न्यायालय परीक्षण-न्यायालय द्वारा दिए गए दंडादेश की पुष्टि कर सकता है अथवा उसको उलट सकता है, अभियुक्त को विमुक्त कर सकता है, सिद्धदोष ठहरा सकता है या उस अभियोग से मुक्त कर सकता है जिसके लिए उसका परीक्षण हुआ था अथवा दंडादेश यथास्थित रखते हुए संमति बदल सकता है, परंतु दंडादेश की वृद्धि नहीं कर सकता। वह पुन: परीक्षण अथवा परीक्षणार्थ समर्पण का आदेश भी दे सकता है। (धारा 423, दंड-प्रक्रिया-संहिता)। संविधान के अनुच्छेद 132 से 136 तक के उपबंधों के अनुसार किसी उच्च न्यायालय या अंतिम क्षेत्राधिकारवाले किसी न्यायाधिकरण के निर्णय के विरुद्ध, उच्चतम न्यायालय में अपील हो सकती है। अनुच्छेद 132 के अंतर्गत किसी भी निर्णय, आज्ञप्ति अथवा दंडादेश के विरुद्ध अपील उच्चतम न्यायालय में हो सकती है, यदि उच्च न्यायालय प्रमाणित कर दे कि उस मामले में संविधान के निर्वचन का कोई सारवान विधिप्रश्न अंतर्ग्रस्त है। यदि उच्च न्यायालय ऐसा प्रमाणपत्र देना स्वीकार कर दे तो उच्चतम न्यायालय अपील के लिए विशेष इजाजत दे सकता है। जहाँ उच्च न्यायालय ऐसा प्रमाणपत्र दे देता है अथवा उच्चतम न्यायालय विशेष इजाजत दे देता है वहाँ उच्चतम न्यायालय की अनुज्ञा से संविधान के निर्वचन संबंधी प्रश्न के अतिरिक्त अन्य प्रश्न भी उठाए जाए सकते हैं। उच्च न्यायालय के किसी अंतिम निर्णय, आज्ञप्ति या आदेश अपील उच्चतम न्यायालय में हो सकती है, यदि उच्च न्यायालय यह प्रमाणित कर दे कि (क) विवादविषय की राशि या मूल्य प्रथम बार के न्यायालय में बीस हजार रुपए या किसी ऐसी अन्य राशि से, जो इस बारे में उल्लिखित की जाए, कम नहीं है, अथवा (ख) उसमें उतनी राशि या मूल्य की संपत्ति से संबद्ध कोई वाद या प्रश्न प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में अंतग्रस्त है, अथवा (ग) मामला उच्चतम न्यायालय में अपील के योग्य है। यदि उच्च न्यायालय का निर्णय पूर्ववत् नीचे के न्यायालय के निश्चय की पुष्टि करता है तब उच्च न्यायालय को यह और प्रमणित करना होता है कि अपील में कोई सारवान् विधिप्रश्न अंतर्ग्रस्त है (अनुच्छेद 133)। उच्च न्यायालय की किसी दंड कार्रवाई में दिए हुए निर्णय या अंतिम आदेश की अपील उच्चतम न्यायालय में होती है, यदि उच्च न्यायालय ने अपील में अभियुक्त व्यक्ति को मृत्युदंडादेश दिया है; अथवा उच्च न्यायालय प्रमाणित करता है कि मामला उच्चतम न्यायालय में अपील करने योग्य है। अनुच्छेद 136 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय की विशेष अनुमति से अपील हो सकती है।
सारांश:
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