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=== रोमन साम्राज्य में प्रसार (30 - 313 ई.) === 1. ईसा की मृत्यु के बाद उनके शिष्य [[यहूदी|यहूदियों]] तथा गैर यहूदियों में ईसाई धर्म का प्रचार करने लगे। प्रथम मिशनरियों में से सबसे सफल थे संत पौलुस; उनकी यात्राओं का वर्णन तथा उनके पत्र बाईबिल के उत्तरार्ध में सुरक्षित हैं। उस समय अंतिओक (Antioch) रोमन साम्राज्य का तीसरा शहर था, ईस का उत्तराधिकारी संत पेत्रुस यहीं चले आए और उस केंद्र से संत पौलुस ने एशिया माइनर, मासेदोनिया तथा यूनान में ईसाई धर्म का प्रचार किया। बाद में राजधानी [[रोम]] ईसाई धर्म का प्रधान केंद्र बना। वहीं [[संत पेत्रुस]] (67 ई.) और [[संत पौलुस]] शहीद हो गए। बाइबिल का उत्तरार्ध प्रथम शताब्दी ई. के उत्तरार्ध में लिखा गया। सन् 100 ई. तक [[भूमध्य सागर|भूमध्यसागर]] के सभी निकटवर्ती देशों और नगरों में, विशेषकर [[आनातोलिया|एशिया माइनर]] तथा उत्तर अफ्रीका में ईसाई समुदाय विद्यमान थे। तीसरी शताब्दी के अंत तक ईसाई धर्म विशाल रोमन साम्राज्य के सभी नगरों में फैल गया था; इसी समय फारस तथा दक्षिण रूस में भी बहुत से लोग ईसाई बन गए। इस सफलता के कई कारण हैं। एक तो उस समय लोगों में प्रबल धर्मजिज्ञासा थी, दूसरे ईसाई धर्म प्रत्येक मानव का महत्व सिखलाता था, चाहे वह दास अथवा स्त्री ही क्यों न हो। इसके अतिरिक्त ईसाइयों में जो भातृभाव था उससे लोग प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। 2. प्रथम तीन शताब्दियों के इतिहास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि समय पर शासकों द्वारा ईसाइयों पर अत्याचार किया गया और वे बड़ी संख्या में अपना धर्म छोड़ देने की अपेक्षा सानंद यंत्रणा एवं मृत्यु स्वीकार करते थे। यद्यपि रोमन शासक प्रारंभ ही से उस नए धर्म को संदेह की दृष्टि से देख्ते थे और उसके अनुयायियों को सताते थे, फिर भी केवल तीसरी शताब्दी में ईसई धर्म को पूर्ण रूप से मिटाने का ध्यापक प्रयत्न किया गया था, विशेष रूप से देसियस, डाइयोक्लीशन (Diocletian), मस्किमिनियन और गालेरियस के शासनकाल में (तीसरी के उत्तरार्ध तथा चतुर्थ शताब्दी के प्रारंभ में)। 3. संगठन इस प्रकार था : हर शहर में स्थानीय गिरजे का परमाधिकारी धर्माध्यक्ष (बिशप) कहलाता था, उनके शासन में पुरोहित (याजक) और उपपुरोहित (उपयाजक या डीकन) धर्म कार्यो में लगे रहते थे। रोम, सिकंदरिय, अंतिओक (और बाद में कुछ और महत्वपूर्ण शहरों) में बिशपों को पेत्रिआर्क (Patriarch) की उपाधि दी जाती थी किंतु सर्वत्र रोम के बिशप का विशेष अधिकार माना जाता था। 4. प्रारंभिक ईसाई साहित्य प्रधानतया यूनानी भाषा में लिखा गया है। [[ओरिजेन]] और संत इरेनेयस विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इरेनेयस (130-202 ई.) ने तत्कालीन भ्रामक धारणाओं का विरोध करते हुए रोमन चर्च की शिक्षा को सच्ची ईसाई शिक्षा की कसौटी घोषित किया। उन्होंने अधिकतर ईसाई गूढ़ज्ञानवाद (Gnosticism) का खंडन किया। गूढ़ज्ञानवाद ईसा के पूर्व ही से चला आ रहा था किंतु बाद में इसमें ईसाई तत्वें का समावेश किया गया था। उस वाद का मूलभूत सिद्धांत है कि समस्त भौतिक जगत् और मानवशरीर भी दूषित है। किसी न किसी रूप में यह सिद्धांत शताब्दियों तक जीवित रहा। उत्तरी अफ्रीका के निवासी तेरतुलियन (Tertullian 160-220 ई.) [[लातिन भाषा|लैटिन भाषा]] के प्रथम विख्यात ईसाई लेखक हैं। दूसरी शताब्दी के अंत तक एदेस्सा के आसपास सिरियक भाषा में ईसाई साहित्य की रचना प्रारंभ हो गई थी।
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