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== काव्य-सम्प्रदाय == "अलंकारसर्वस्व" के टीकाकार समुद्रबन्ध ने काव्यशास्त्र के अनेक सम्प्रदायों की विशिष्टता की सुन्दर विवरण प्रस्तुत किया है। काव्य के विभिन्न अंगों पर महत्त्व तथा बल देने से विभिन्न संप्रदायों की विभिन्न शताब्दियों में उत्पत्ति हुई। मुख्य सम्प्रदायों की संख्या छह मानी जा सकती है- *(1) रस सम्प्रदाय, *(2) अलंकार सम्प्रदाय, *(3) रीति या गुण सम्प्रदाय, *(4) वक्रोक्ति सम्प्रदाय, *(5) ध्वनि सम्प्रदाय, *(6) औचित्य सम्प्रदाय। इन सम्प्रदायों ने अपने नाम के अनुसार तत्तत् (वे वे गुण) 'काव्य की आत्मा' अर्थात् मुख्य प्राण स्वीकार किया है। (1) '''रस संप्रदाय''' के के मुख्य आचार्य [[भरत मुनि]] हैं (द्वितीय शताब्दी) जिन्होंने नाट्यरस का ही मुख्यत: विश्लेषण किया और उस विवरण को अवान्तर आचार्यों ने काव्यरस के लिए भी प्रामाणिक माना। (2) '''अलंकार संप्रदाय''' के प्रमुख आचार्य [[भामह]] (छठी शताब्दी का पूर्वार्ध), [[दण्डी|दंडी]] (सातवीं शताब्दी), [[उद्भट]] (आठवीं शताब्दी) तथा [[रुद्रट]] (नवीं शताब्दी का पूर्वार्ध) हैं। इस मत में [[अलंकार]] ही काव्य की आत्मा माना जाता है। इस शास्त्र के इतिहास में यही संप्रदाय प्राचीनतम तथा व्यापक प्रभावपूर्ण अंगीकृत किया जाता है। (3) '''रीति संप्रदाय''' के प्रमुख आचार्य [[वामनावतार|वामन]] (अष्टम शताब्दी का उत्तरार्ध) हैं जिन्होंने अपने "काव्यालंकारसूत्र" में [[रीति संप्रदाय|रीति]] को स्पष्ट शब्दों में काव्य की आत्मा माना है (''रीतिरात्मा काव्यस्य'')। दण्डी ने भी रीति के उभय प्रकार--वैदर्भी तथा गौड़ी--की अपने "[[काव्यादर्श]]" में बड़ी मार्मिक समीक्षा की थी, परन्तु उनकी दृष्टि में काव्य में अलंकार की ही प्रमुखता रहती है। (4) '''वक्रोक्ति संप्रदाय''' की उद्भावना का श्रेय आचार्य [[कुंतक|कुन्तक]] को (१०वीं शताब्दी का उत्तरार्ध) है जिन्होंने अपने "[[वक्रोक्तिजीवित]]" में "[[वक्रोक्ति सिद्धान्त|वक्रोक्ति]]" को काव्य की आत्मा (जीवित) स्वीकार किया है। (5) '''ध्वनि संप्रदाय''' का प्रवर्तन [[आचार्य आनन्दवर्धन|आनन्दवर्धन]] (नवम शताब्दी का उत्तरार्ध) ने अपने युगान्तरकारी ग्रंथ "[[ध्वन्यालोक]]" में किया तथा इसका प्रतिष्ठापन [[अभिनवगुप्त|अभिनव गुप्त]] (१०वीं शताब्दी) ने ध्वन्यालोक की लोचन टीका में किया। [[आचार्य मम्मट|मम्मट]] (11वीं शताब्दी का उत्तरार्ध), [[रुय्यक]] (12वीं शताब्दी का पूर्वार्ध), [[हेमचन्द्राचार्य|हेमचन्द्र]] (12वीं शताब्दी का उत्तरार्ध), पीयूषवर्ष जयदेव (13वीं शताब्दी का उत्तरार्ध), [[आचार्य विश्वनाथ|विश्वनाथ कविराज]] (14वीं शताब्दी का पूर्वार्ध), [[जगन्नाथ पण्डितराज|पंडितराज जगन्नाथ]] (17वीं शताब्दी का मध्यकाल)--इसी संप्रदाय के प्रतिष्ठित आचार्य हैं। (6) '''औचित्य संप्रदाय''' के प्रतिष्ठाता [[क्षेमेंद्र|क्षेमेन्द्र]] (११वीं शताब्दी का मध्यकाल) ने भरत, आनन्दवर्धन आदि प्राचीन आचार्यों के मत को ग्रहण कर काव्य में [[औचित्य]] तत्त्व को प्रमुख तत्त्व अंगीकार किया तथा इसे स्वतंत्र संप्रदाय के रूप में प्रतिष्ठित किया। अलंकारशास्त्र इस प्रकार लगभग दो सहस्र वर्षों से काव्यतत्वों की समीक्षा करता आ रहा है।
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