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== विकास का इतिहास == क्रिस्टलकी को सबसे पहली महत्वपूर्ण देन [[डेनमार्क]]वासी चिकित्सक निकोलस स्टैनों की है। सन् 1669 में आपने बतलाया कि एक क्रिस्टल के कुछ कोण सदा बराबर रहते हैं, चाहे फलकों के रूप और आकार में कितना ही अंतर क्यों न हो। कुछ वर्ष बाद हाइगेंज़ (Hughens, 1678 ई.) ने [[कैल्साइट]] की [[द्विअपवर्तन]] (double refraction) क्रिया को समझाने के लिये यह मान लिया कि वह छोटे-छोटे दीर्घवृत्तजीय कणों के नियमित रूप में सुव्यवस्थित होने से बना है और इस आधार पर आपने क्रिस्टल की आकृति, विदलन (cleavage), उसकी कठोरता में विभिन्नता और दिशाओं के साथ साथ द्विअपवर्तन की व्याख्या की। 18वीं शताब्दी में क्रिस्टलकी के क्षेत्र में कोई विशेष प्रगति नहीं हुई। केवल विलायकों के, जिनमें विलेय पदार्थ थे, वाष्पीकरण से क्रिस्टल तैयार किए गए। इन्हें 'कृत्रिम क्रिस्टल' कहा गया। रोमे दि ल आइल (Rome' de l' Isle) ने अनेक प्राकृतिक और कृत्रिम क्रिस्टलों का संस्पर्श क्रिस्टल कोणमापी नामक यंत्र की सहायता से अध्ययन किया। यह यंत्र उनके सहायक कारनग्यो (Carangeot) ने सन् 1780 में कोण मापने के लिये बनाया था। इस आधार पर आपने छह "प्राथमिक आकृतियाँ" स्थापित कीं : घन, सम अष्टफलक, समचतुष्फलक, समांतर षट्फलक, समचुतर्भुज आधार पर अष्ट फलक तथा दुहरा छह फलकों वाला पिरैमिड। अन्य आकृतियों के लिये यह कल्पना की गई है कि वे उपर्युक्त प्रत्येक आकृति के किनारों (edges) और घन कोणों के फलकों द्वारा प्रतिस्थापन से निर्मित हुई हैं। रोमे दि ल आइल की पहली कृति 1772 ई में प्रकाशित हुई। उसका दूसरा विस्तृत संस्करण 1783 ई में छपा। आपके कार्य के फलस्वरूप अंतराफलक कोण (interfacial angle) की स्थिरता का नियम, जिसकी नींव 100 वर्ष पूर्व स्टैनों द्वारा रखी जा चुकी थी, पूर्ण रूप से स्थापित हो गया। यद्यपि क्रिस्टलविज्ञानी क्रिस्टल की संभाव्य आंतरिक संरचना के विषय में पहले से ही परिकल्पना कर रहे थे, पर इस संबंध में सुव्यस्थित वर्णन सबसे पहले सन् 1784 ई. में ऐबि औई (Abbe Haiiy) ने किया। क्रिस्टल की आकृति से संबद्ध विदलन की सतहों का निरीक्षण करते समय आपने यह विचार स्थापित किया कि एक क्रिस्टल सब से छोटी संभव अणु एकक (molecule intergrante) की पुनरावृत्ति से बना है। इस आधारभूत एकक की आकृति को उस क्रिस्टल की सममिति के अनुरूप माना गया। इसी एकक के आधार पर भिन्न भिन्न स्वभाव के क्रिस्टलों की रचना हो सकती थी, यदि चयन (stacking) की प्रगति के साथ साथ कुछ पंक्तियाँ नियमित रूप से छोड़ दी जातीं। इस प्रकार घनकों (cubelets) की इकाई से एक विषमलंबाक्ष द्वादशफलक (rhombic dodecahedron) बन सकता है, यदि घन नमूने का चयन करते समय किनारों पर के "घनकों" को छोड़ दिया जाय। यही इकाई एक अष्टफलक बना सकती है, यदि कोनों पर से घनकों का चयन छोड़ दिया जाय। पूर्ण क्रिस्टल और उसकी आधारभूत इकाई के संबंध के आधार पर औई ने "परिमेय घातांक" (rational indices) के नियम को, जो क्रिस्टलकी का सबसे महत्वपूर्ण नियम है, स्थापित किया। औई की इस खोज की महत्ता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि उन्हें क्रिस्टलकी का जन्मदाता कहा जाता है। औई के "परिमेय घातांक" के नियम के आधार पर सन् 1830 में हेज़ेल (Hessel) ने यह ज्ञात किया कि समतल फलकों वाले ठोस पिंडों में 32 प्रकार की सममितियाँ संभव हैं। आपका कार्य दीर्घकाल तक अनजाने में ही पड़ा रहा। स्वतंत्र रूप से गाडोलिन फॉन लैंग (Gadolin von Lang) भी उसी निष्कर्ष पर पहुंचे जिस पर हेज़ेल पहुँचे थे और उन्होंने 1870 ई. में इस तथ्य को पूर्ण रूप से स्थापित कर दिया। औई की खोज के पश्चात क्रिस्टल की आंतरिक संरचना के कार्य में प्रगति होती रही और यह मान लिया गया कि बृहत् क्रिस्टल की संरचना क्रिस्टल की आणविक इकाई या बहुआणविक इकाइयों के क्रिस्टल द्वारा घिरे स्थान की पुनरावृत्ति के फलस्वरूप होती है। इस क्षेत्र में सीबर (Seeber, 1824 ई.), डेना (Dana, 1836 ई.), ब्रूस्टर (Brewster, 1839 ई.), देलाफॉस (Delafosse, 1843 ई.) आदि के नाम उल्लेखीय है। पर क्रिस्टल की इकाइयों की रचना और आकृति के संबंध में कोई विशेष प्रगति नहीं हुई। पिछले वर्षों में बहुत से गणितज्ञ और क्रिस्टलविज्ञानी उन भिन्न भिन्न विन्यासों की खोज में लगे रहे जिनके द्वारा विभिन्न समुदायों के क्रिस्टल अपनी इकाई कोशिकाओं (unit cells) से बने। इस दिशा में पहली कृति फ्रांकेनहाइम (Frankenhime, 1842 ई.) की थी। इनका विश्वास था कि 15 प्रकार के विभिन्न विन्यास संभव हैं। ये विन्यास त्रिविमजालक (space lattice) प्रकृति के थे। ब्रेवेस (Bravais, 1848 ई.) ने फ्रांकेनहाइम के त्रिविमजालकों के लिये पुष्ट प्रमाण दिए और यह भी दिखलाया कि उन 15 में से दो विन्यास बिल्कुल समान हैं। उसने इन 14 त्रिविमजालकों को, जो क्रिस्टल संरचना की नींव हैं, सात समुदायों में विभक्त कर दिया (इसमें त्रिकोणीय और षट्कोणीय पृथक समुदाय माने गए हैं)। ब्रेवैस ने यह भी सुझाव दिया कि प्रत्येक अणु के गुरुत्वकेंद्र के चारों ओर परमाणुओं की ज्यामितीय व्यवस्था समान है। दूसरे शब्दों में, ब्रेवेस के त्रिविमजालक में प्रत्येक बिंदु का पर्यावरण प्रत्येक दूसरे बिंदु के पर्यावरण के समान है और यह समान रूप से ही अभिविन्यस्त (oriented) है। उपर्युक्त बिंदु अणुओं के गुरुत्व केंद्र का द्योतक है। यही सिद्धांत वीनेर (Wiener, 1869 ई.) ने भी स्वतंत्र रूप से स्थापित किया। तुल्यरूप (analogous) परमाणुओं की व्यवस्था की नियमितता के अंतर्गत प्रत्येक ऐसा परमाणु आ जाता है, जिसके चारों ओर दूसरे परमाणु उसी तरीके से व्यवस्थित होते हैं। उसी वर्ष जॉर्डन (1869 ई.) ने क्रिस्टलों का सन्दर्भ न देकर, केवल गणित के आधार पर यह पता लगाया कि तथाकथित सर्वथा समभागों की नियमित आवृत्ति कितने प्रकार से संभव है। वीनेर के सिद्धांत को मानकर तथा जॉर्डन की विधि को क्रिस्टल में प्रयुक्त कर सोहंके (Sohancke, 1879-1892 ई.) ने ज्ञात किया कि 65 बिंदु (मूलत: 66, पर जिनमें से दो बाद को एक समान पाए गये) खास तरीकों से अवकाश (space) में व्यवस्थित हो सकते हैं, जबकि केवल समान पर्यावरण की आवश्यकता है न कि समान अभिविन्यास की, जैसा कि ब्रेवैस के त्रिविमजाल में। इन 65 बिंदुसमुदायों से ऐसी संरचनात्मक व्यवस्था प्राप्त हुई जिससे केवल विभिन्न समुदायों के पूर्णफलकीय (holohedral) वर्ग की ही नहीं, जैसा कि ब्रेवैस त्रिविमजालक में भी थी, वरन् उससे भी नीचे के बहुत से वर्गों की सममिति प्राप्त हुई। त्रिविमदिक् में परावर्तन (reflection) तथा प्रतिलोमन (inversion) क्रियाओं का समावेश कर फ़ेडोरॉफ़ (Fedorow, 1885-1890 ई.), शौएनफ्लाइज़ (Schoenflies, 1891 ई.) और बार्लो (Barlow, 1894 ई.) ने स्वतंत्र रूप से तथा विभिन्न तरीकों से अध्ययन कर 195 संरचनात्मक अणुविन्यास व्यवस्थाएँ ज्ञात कीं। इस प्रकार सब बिंदु समुदाय या वर्ग 230 हो गए। अब नीचे की श्रेणी की सममिति को भी समझना संभव हो गया। इस प्रकार स्थापित 32 सममिति वर्ग (रचना के बिंदु वर्ग) क्रिस्टल सममिति के 32 वर्गों से, जो कि आकृतिक क्रिस्टलकी (morphological crystallography) में माने जाते हैं, मेल खाते हैं। यद्यपि क्रिस्टल संरचना का ज्यामितीय सिद्धांत पिछली शताब्दी के अंतकाल में सफलतापूर्वक स्थापित हुआ, पर क्रिस्टल के विशेषज्ञ क्रिस्टल के मौलिक इकाई के आकार, माप और स्वभाव के बारे में अनभिज्ञ ही थे। इकाइयों को अब तक औई का घन समांतरफलक (parallelepipeda), या फेडोरॉफ (1904 ई.) का समातंर फलक (parallelohedra), समझा जाता था। पोप और बालों (1906 ई.) के विचार में ये बहुफलकीय इकाइयाँ प्रत्यास्थ (elastic), पर असंपीड्य (incompressible) और विरूपणीय (deformable) गोलों के संघनित समुच्चय से व्युत्पन्न हैं। रंटगेन (Roentgen, 1896 ई.), द्वारा एक्स किरण की खोज तथा फॉन लावे (1912 ई.) द्वारा क्रिस्टल की आतंरिक संरचना जानने के लिये उसका उपयोग होने के बाद ही, इन इकाइयों को परमाणु समुच्चय के रूप में प्रभाव क्षेत्र (spheres of influence) माना गया। कुछ वैज्ञानिकों ने एक्स किरणपुंज के विवर्तन (diffracdtion) के लिये क्रिस्टल के क्रमबद्ध परमाणुओं को उचित ग्रटिंग (grating) के रूप में उपयोग करने की बात सोची। इस संबंध में पहले प्रयोग उनके साथियों, फ्रीडरिक (Friedrich) और निपिंग (Knipping), द्वारा किए गए। श्वेत एक्स किरणपुंज को एक क्रिस्टल में ले होकर भेजा गया और उसे एक फोटोग्राफिक प्लेट पर लिया गया। इस प्लेट को धोने पर एक केंद्रीय काले हिस्से के चारों ओर बहुत से काले धब्बे प्रकट हुए, जो एक नियमित पैटर्न में थे। इस प्रकार के फोटोग्राफ के अध्ययन से अपेक्षाकृत सरल क्रिस्टलों की संरचना को जान लेना संभव हुआ। लावे की खोज के बाद सुधारे हुए तकनीकों से दूसरे कार्यकर्ताओं ने शोध की गति बढ़ा दी। डब्ल्यू एच ब्रैग और डब्ल्यू एल ब्रैग (1913 ई.) ने क्रिस्टलों की ज्ञात दिशाओं में कटी प्लेटों को एक एक्स किरण स्पेक्ट्रोमीटर पर, जिसमें एकवर्णी (monochromatic) विकिरण प्रयोग करने की व्यवस्था थी, घुमाया। डिबाई और शेरर (Debye and Scherrer) ने क्रिस्टल के चूर्ण को दबाकर एक छोटे दंड में ठूँस और दंडाकृति देकर, उसे एक बेलनाकार सूक्ष्मग्राही फिल्म की नली के अक्ष में रखा और इस दंड पर एकवर्णीय एक्स किरणें डालीं। इस प्रकार से प्रभावित फिल्म को डिवेलप करने पर कुछ वक्र रेखाएँ प्राप्त हुईं। यही ऐक्स किरण व्यतिकरण आकृतियाँ (interference figures) थीं। शीबोल्ड (Schiebold, 1922 ई.) ने एक विधि निकाली, जिसमें पूरे क्रिस्टल को एक मुख्य मंडल (zone axis) में घुमाया जाता है और उसपर एकवर्णी विकिरण डाला जाता है। इसमें विवर्तन जानने के लिये या तो एक सपाट या एक बेलनाकार फोटोग्राफिक प्लेट काम में लाई जा सकती है। इस विधि के द्वारा क्रिस्टल की इकाई कोशिका (unit cell) की विमाएँ ठीक ठीक प्रकार मापी जा सकती हैं। इस घूर्णन विधि में वाइज़नवर्ग (Weissenberg) ने और सुधार किया। क्रिस्टल को एक छोटे कोण की सीमा के भीतर में इधर उधर दोलित किया जाता है और बेलनाकार कैमरा क्रिस्टल के साथ ही साथ इस तरह घूमता है कि उद्भासन (exposure) के समय बराबर उसके साथ रहता है। एक्स किरण विश्लेषण द्वारा ज्ञात की गई इकाई कोशिका की विमाएँ प्राय: सभी खनिजों में क्रिस्टल कोणमापी द्वारा जाने हुए अक्षनुपात (axial ratio) से मेल खाती हैं। एक्स किरण विश्लेषण द्वारा हम क्रिस्टल की संरचना को पूर्णतया जान सकते हैं। पहले क्रिस्टल को उचित त्रिविम वर्ग में रखा जाता है, तत्पश्चात् उसकी इकाई कोशिका की अंर्तवस्तु की जानकारी की जाती है।
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