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== स्वतंत्रता के बाद से 1990 तक == 1947 से 1990 तक भारत मे खुली अर्थव्यवस्था नही थी। भारत ने [[आयात]] और [[निर्यात]] पे कयी तरह के [[कर]] लगाये जाते थे। निर्यात पे होने वले करों की वजह से भारतीय उद्योग यहा बनाया हुआ माल [[अंतर-राश्ट्रीय बाज़ार]] मे सस्ता नही बेंच पाते थे। अंतर-राश्ट्रीय बाज़ार की प्रतिस्पर्धा मे भारतीय उद्योगों के ना टिक पाने से भारत पीछे रह गया। इस दौरान [[जापान]], [[चीन]], [[कोरिया]], [[ताइवान]] जैसे देशो ने अंतर-राश्ट्रीय बाज़ार मे अपना दब्दबा बनाया। भारत मे [[आयात]] पर भी काफी कर लगाये जाते थे। इस कारण से विदेशी उद्योग भारत मे अपना सामान बेचने मे दिक्कत कह्सूस कर्ते थे। विदेशों बने समान भारत मे बहुत महंगे होने की वजह से भारत मे ज़्यादा लोग खरीद नही पाते थे। जो तक्नीक भारत के बाहर जन्म लेती थी वे आसानी से भारत के लोगों तक नही पहुंच पाती थीं। इस्से एक तरफ तो भारत के नागरिक 1947 से 1980'ज़ तक [[कम्प्यूटर]], आधुनिक [[घडी|घडियों]], आधुनिक [[टेलीफोन]], [[कार|कारों]], इत्यादि से वंचित रह गये तो दूसरी तरफ भारतीय उद्योगों को ज़रूरी तक्नीकें नही मिल पयी। अंतर-राश्ट्रीय तरीको और तक्नीकों से अपने उत्पाद न बना पाने की वजह से भारत के कयी उद्योग जैसे [[टैक्स्टाइल]], [[कृशि]], [[एवियेशन]], [[मन्युफैक्चरिंग]], इत्यादि अंतर-राश्ट्रीय मानकों से पीछे रह गये। भारत का [[ग्रोथ रेट]] करीब 3.0% रह गया और इसे विश्व मे [[हिन्दू ग्रोथ रेट]] से जाना जाने लगा। भारत के उद्योगों के विकसित ना हो पाने की वजह से भारत के तमाम लोग [[गरीबी रेखा]] से नीचे रह गये। इस दौरान भारत के [[मूल्भूत धांचे]] (इंफ्रास्ट्रकक्चर) का बहुत धीमि गति से विकास हुआ। भारत का बिजली, पानी, सडके, सूच्ना तंत्र इत्याअदि कफी खराब होता चला गया। [[मुद्रास्फीति]] की दर बहुत ज़्यादा होने से महंगाई कफी बढ्ती चली गयी पर उद्योगों की बीमार हालत के चलते लोगो की आमदनी मुद्रास्फीति दर के बराबर न बढ सकी। भारत मे सन 1985 से [[बैलैंस औफ पेमेंट]] की सम्सया शुरू हुई। 1991 मे [[चन्द्रशेखर सरकार]] के शासन के दौरान भारत मे बैलैंस औफ पेमेंट की समस्या ने विकराल रूप धारण किया और भारत की पहले से चर्मरायी हुई अर्थव्यवस्था घुट्नो पे आ गयी। भारत मे विदेशी मुद्रा का भंडार केवल तीन हफ्ते के आयातो के बराबर रह गया। ये एक बहुत ही गम्भीर समस्या थी। इस दौरान समस्या इत्नी गम्भीर हो चुकी थी कि भारत के पास देश को चलाने के लिये जरूरी धन खतम हो गया था। भारत सरकार ने अपने स्वर्ण भन्डार से सोना बैंक ओफ इंग्लैंड के पास गिरवी रखने की तैयारियां शुरू कर दी थी। [[नर्सिम्हा राओ]] के नेत्रत्व वाली भारतीय सरकार ने भारत मे बडे पैमाने मे [[आर्थिक सुधार]] कर्ने क फैस्ला किया। [[उदारीकरण]] कह्लाने वाले इन सुधारो के आर्किटेक्ट थे [[मनमोहन सिंह]]। [[मनमोहन सिंह]] ने आने वाले समय मे भारत की अर्थ्नीति को पूरी तरह से बदल्ने की शुरुआत की। ये वोह समय था जबकि भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को खुला करने की शुरुआत की। ज़्यादातर लोगों के नज़रिये से 1990 से अबक किये गये आर्थिक सुधारों ने ही भारत को दुनिया में एक सशक्त आर्थिक देश का दर्ज़ा दिलाया।
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