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==माधुर्य भक्ति का वर्णन == भट्ट जी के उपास्य नित्य वृन्दावन में वास करने वाले राधा-कृष्ण है। उनका रूप , स्वभाव ,शील ,माधुर्य आदि इस प्रकार का है कि चिन्तन लिए मन लुब्ध हो जाता है। उनके अनुसार कृष्ण व्रजराज कुल- तिलक ,राधारमण ,गोपीजनों को आनन्द देने वाले ,दुष्ट दानवों का दमन करने वाले ,भक्तों की सदा रक्षा करने वाले ,लावण्य -मूर्ति तथा ब्रह्म ,रूद्र आदि देवताओं द्वारा वन्दित हैं।: ;जय महाराज ब्रजराज कुल तिलक , ;गोविन्द गोपीजनानन्द राधारमन। ;बल दलन गर्व पर्वत विदारन। ;ब्रज भक्त रच्छा दच्छ गिरिराज धरधीर। कृष्ण -प्रेयसी राधा सकल गुणों की साधिका ,तरुणी-मणि और नित्य नवीन किशोरी है। वे कृष्ण के रूप के लिए लालायित और कृष्ण-मुख-चन्द्र की चकोरी हैं। कृष्ण स्वयं उनकी रूप-माधुरी का पान करते हैं। गौरवर्णीय राधा का मन श्याम रंग में रंगा हुआ है और ६४ कलाओं में प्रवीण होते हुए भी भोली हैं। ;जयति श्री राधिके सकल सुख साधिके, ;तरुनि मनि नित्य नवतन किशोरी। ;कृष्ण तनु लीन मन रूप की चटकी, ;कृष्ण मुख हिम किरण की चकोरी।। ;कृष्ण दृग भृंग विश्राम हित पद्मिनी, ;कृष्ण दृग मृगज बन्धन सुडोरी। ;कृष्ण अनुराग मकरंद की मधुकरी, ;कृष्ण गुनगान रससिन्धु बोरी।। ;एक अद्भुत अलौकिक रीति मैं लखी, ;मनसि स्यामल रंग अंग गोरी। ;और आश्चर्य कहूँ मैं न देख्यो सुन्यो, ;चतुर चौसठिकला तडवी भोरी।।
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