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== संत गरीब दास जी की अमृतवाणी == संत गरीब दास जी ने अमृतवाणी में सप्ताह के सभी दिनों का अलग-अलग वर्णन किया है। अन्तर साधना ही मनुष्य मात्र का परम लक्ष्य है जिसकी और सतगुरु महाराज जी ने निम्नानुसार संकेत किया है।<ref>Dr Mahendra Singh Arya, Dharmpal Singh Dudee, Kishan Singh Faujdar & Vijendra Singh Narwar: Adhunik Jat Itihas (in Hindi) (The modern history of Jats), Agra 1998, Section 9, p.81 </ref> * "सातों बार समूल बखानो, पहर घड़ी पढ़ ज्योतिष जानो." - सतगुरु जी महाराज कहते हैं। सभी दिनों हमारा क्या ज्योतिष कहता है, वही मैं वर्णन करता हूँ. * "इतवार अन्तर नहीं कोई, लगी चांचरी पद में सोई." - रविवार का दिन तभी शुभ मंगलकारी होता है जब जीव की वृति चांचरी मुद्रा द्वारा सत्य पद में लगी रहे. * "सोम मंगल करो दिन राती, दूर करो न दिल की काती." - सोमवार के दिन हमारा ज्योतिष यही संकेत करता है कि दिन रात सचेत होकर अपने अमोलक स्वासों की संभाल करो. * "मंगल मन की माला फेरो, चौदह कोटि जीत जम जेरो." - मंगलवार के दिन मानसिक जाप अर्थात शब्द का सुरती से अभ्यास करते हुए स्वास रुपी माला को फेरो. मानसिक जप से यमराज के चौदह करोड़ यमदूत पर विजय पाकर परम पद की प्राप्ति करो. * "बुध बिनानी विद्या दीजे, सत सुकृत निज सुमरण कीजे." - बुधवार के दिन सत स्वरुप ईश्वर का सुमिरन करते हुए ईश्वर ब्रह्म-विद्या अर्थात विवेक मान की मांग करें. * "बृहस्पति भ्यास भये वेरागा, तांते मन राते अनुरागा." - जो मनुष्य गुरुवार के दिन वैराग्य सहित स्वास द्वारा सुरती शब्द का अभ्यास करता है उसी का मन पारब्रह्म प्रभु के प्रेम में निमग्न होता है। * "सनीचर स्वासा मांहि समोया, जब हम मक्र्तार मग जोया." सतगुरु देव कहते हैं कि शनिवार के दिन हमने सुरती को शब्द में मिलकर स्वास द्वारा जब ध्यान किया जाता है तब हमने मक्रतार मार्ग को देखा . <blockquote> </blockquote>'''II संत गरीबदास की बाणी II '''<ref>{{Cite web |url=http://www.satsahib.org/ |title=Satsahib.org |access-date=14 जून 2020 |archive-url=https://web.archive.org/web/20190903215739/http://satsahib.org/ |archive-date=3 सितंबर 2019 |url-status=dead }}</ref> <blockquote> * अमर करूं सतलोक पठाँऊ,, ताते बन्दी छोड़ कहा I हम ही सतपुरुश दरवानी, मेट्टू उत्पति आवाजानी I * जो कोई कहा हमारा माने, सार शब्द कुं निश्चय आने I हम ही शब्द शब्द की खानी, हम अविगत प्रवानी I * हमरे अनहद बाजे बाजे, हमरे किये सभे कुछ साजे I हम ही लहर तरंग उठावे, हम ही प्रगट हम छिप जावे I * हम ही गुप्त गुह्ज गम्भीरा, हम ही अविगत हमे कबीरा I हम ही गरजे, हम ही बरषे, हम ही कुलफ जड़े हम निरखे I * हम ही सराफ जोहरी कहिया, हमरे हाथ लेखन सब बहिया I यह सब खेल हमरे किये, हमसे मिले सो निश्चय जीये I * हम ही अदली जिन्दा जोगी, हम ही अमी महारस भोगी I हमरा भेद न जाने कोई, हम ही सत्य शब्द निर्मोही I * ऐसा अदली दीप हमारा, कोटि बैकुण्ठ रूप की लारा I संख पदम एक फुनि पर साजे, जहाँ अदली सत्य कबीर विराजे I * जहाँ कोटिक विष्णु खड़े कर जोरे, कोटिक शम्भु माया मोरे I जहाँ संखो ब्रह्म वेद उचारी, कोटि कन्हेया रास विचारी I * हम है अमर अचल अनरागी, शब्द महल में तारी लागी I दास गरीब हुक्म का हेला, हम अविगत अदली का चेला I </blockquote>
सारांश:
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