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==भाषा एवं शैली== जपुजी श्री गुरुनानकजी की आध्यात्मिक वाणी के साथ ही अद्वितीय साहित्यिक रचना भी है। इसकी प्रश्नोत्तर शैली पाठक के भावों पर अमिट छाप छोड़ती है। इसमें स्वयं गुरुजी ने जिज्ञासु के मन के प्रश्नों या आशंकाओं का उल्लेख करके उनका तर्कपूर्ण ढंग से समाधान किया है। इसमें संदेह नहीं कि जपुजी एक दार्शनिक और विचार प्रधान कृति है और इसकी रचना गुरुजी की अन्य वाणी की भाँति रागों के अनुसार नहीं की गई है। किन्तु फिर भी इसमें अनेक [[छन्द|छंदों]] का प्रयोग किया गया है। इसमें मुख्य छंद, [[दोहा]], [[चौपाई]] तथा [[नाटक]] आदि हैं। जपुजी के आरम्भ और अन्त में एक श्लोक है। जपुजी के पहले चरण की पहली तीन पंक्तियों का तुकान्त एक है और उसमें आगे तीन पंक्तियों का अलग। 'एक ओंकार...' प्रसादि स्तुति है। 'आदि सच... ही भी सच' भी मंत्र स्वरूप तर्कमयी स्तुति है। वार की भाँति पंक्तियों का तुकांत भी मध्य से ही मिलता है। जैसे : ''हुकमी उत्तम नीचु हुकमि लिखित दुखसुख पाई अहि। : ''इकना हुकमी बक्शीस इकि हुकमी सदा भवाई अहि ॥ ;मध्य अनुरास का एक उदाहरण- : ''सालाही सालाही एती सुरति न पाइया। : ''नदिआ अते वाह पवहि समुंदि न जाणी अहि ॥ इसी तरह कहा जा सकता है कि पौके रूप में विचार अभिव्यक्त करने का प्रारंभ गुरुनानक ने किया। कुछ शब्दों में बार-बार दोहराने से भी संगीतमयी लय उत्पन्न हो गई है। जैसे- तीसरे चरण में 'गावे को' का बार-बार दोहराना सूत्र शैली में शब्दों का प्रयोग बहुत संक्षिप्त रूप से किया गया है। इस संक्षिप्तता तथा संयम के लिए रूपक का प्रयोग अक्सर होता है। जपुजी में रूपक का अधिकतर प्रयोग किया गया है। जैसे- : ''पवणु गुरु पाणी पिता माता धरति महतु। : ''दिवस राति दुई दाई दाइआ खेले सगलु जगतु ॥ जपुजी के अंतिम चरण में [[स्वर्णकार|सुनार]] की दुकान का रूपक मनुष्य के सदाचारी जीवन तथा आत्म प्रगति के साधनों को प्रकट करता है। इसी तरह शरीर को 'कपकहना जिसमें शरीर का नाश तथा फिर नवरूप धारण करने की प्रक्रिया जान पती है। 'आपे बीजे आपे ही खाहु' किसानी जीवन के क्रियाकर्म सिद्धान्त को स्पष्ट करता है। 'मति विचि रत्न जवाहर माणिक' में मनुष्य के गुण आदि को रत्न, जवाहर तथा मोती कहा है। 'असंख सूर मुह भरव सार' कहकर आत्मिक योद्धा की विवशता का दर्शन दिया है जो धर्म क्षेत्र में कुरीतियों का सामना करते हुए उनके वार को झेलता रहता है। 'संतोख थापि रखिया जिनि सूति' कहकर संसार के नियमबद्ध होने का भेद समझा दिया है। जैसे- सूत्र में सब मनके पिरोये रहते हैं, इसी तरह संतोख नियम रूपी धागे में सारा जगत पिरोया हुआ है। बीसवीं पौमें बुद्धि की शुद्धता के लिए बहुत अलंकृत वाणी में मन को सृष्टि के दर्शन को समझाया गया है। गुरुनानकजी लोकगुरु थे। इसीलिए उन्होंने ईश्वरीय संदेश को जन-जन तक पहुँचाने के लिए जपुजी में लोकभाषा का ही सर्वाधिक उपयोग किया। 'जपुजी' की भाषा उस समय की संतभाषा कही जा सकती है, जिसमें [[ब्रज भाषा]] का मिश्रण है। जपुजी के रचनाकाल में संस्कृत के शब्दों को उनके पंजाबी या तद्भव रूप में लिखा जाता था। जपुजी में कुछ शब्द अरबी-फारसी के तत्सम रूप में भी हैं। जैसे-पीर, परो, दरबार, कुदरत, हुक्म आदि। अधिकतर तद्भव रूप ही लिए गए हैं, जैसे हदूरी (हजूरी), नंदरी (नजरी), कागद (कागज) आदि। इसके अतिरिक्त [[योगी|योगियों]] की विशेष प्रकार की शब्दावली पंजाबी रूप में पौ28 और 29 में मिलती है। 'जपुजी' गुरुवाणी में है जो कि गुरुनानक बोलते थे, यद्यपि अक्षरों का आविष्कार उन्होंने नहीं किया था। अपनी विशिष्ट भाषा और सशक्त शैली के माध्यम से गुरुजी ने 'जपुजी' में सर्वोच्च सत्य और उसकी सनातन खोज संबंधी उच्च बौद्धिक एवं अमूर्त विचारों को स्पष्ट एवं सशक्त रूप में अभिव्यक्त किया है। [[आचार्य विनोबा भावे|विनोबाजी]] के कथनानुसार ऐसा करना गुरुनानक का आदर्श था। 'जिव होवे फरमाणु' के भाव की व्याख्या करते हुए उन्होंने लिखा है, "मुझे लगता कि यहाँ [[संस्कृत]] और [[अरबी]] दोनों अर्थ लेकर शब्दों की रचना की है। आखिर गुरुजी [[हिंदू]] और [[मुसलमान]] दोनों को जो चाहते थे, 'सगल जस्माती' करना चाहते थे।
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