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== प्रकाश विद्युत प्रभाव == [[चित्र:Photoelectric effect.svg|thumb|right|150px|[[प्रकाश-विद्युत प्रभाव|प्रकाश विद्युत प्रभाव]] में प्रकाश के [[फोटॉन|फ़ोटोन]] पड़ने पर धातु से [[इलेक्ट्रॉन]] उत्सर्जित होते हैं]] बहुत से वैज्ञानिक प्लांक से सहमत थे,की प्रकाश केवल तरंग ही है और वे प्रयास करने लगे की कोई नया तरीक़ा मिले जिस से यह साबित हो सके। [[अल्बर्ट आइंस्टीन]] ने इस से बिलकुल विपरीत काम किया। उन्होंने स्वीकार लिया के प्रकाश में कणों की भी प्रवृति मौजूद है और इस सच्चाई से एक पुराना मसला हल करने का प्रयास किया। १८८७ में [[हाइनरिख़ हर्ट्ज़]] नाम के एक जर्मन वैज्ञानिक ने मालूम किया था कि जब बहुत कम तरंगदैर्घ्य (वैवलॅन्थ) का प्रकाश कुछ धातुओं और अन्य पदार्थों पर पड़ता है तो बिजली का बहाव पैदा होता है।<ref name="SZY843-4">[http://books.google.com/books?id=SZAwAAAAYAAJ विश्विद्यालय भौतिकी (यूनिवर्सिटी फिज़िक्स, अंग्रेज़ी में)] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20131011103330/http://books.google.com/books?id=SZAwAAAAYAAJ |date=11 अक्तूबर 2013 }}, फ्रैंसिस डब्ल्यू॰ सीअर्ज़, मार्क डब्ल्यू॰ ज़ॅमैन्स्की, ह्यू डी॰ यन्ग, छठा संस्करण, ऐड्डीसन वॅसली, १९८३, पृष्ठ ८४३-४, आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ संख्यांक ०-२०१-०७१९५-९</ref> १९०१ में [[निकोला टेस्ला]] ने दिखाया कि विद्युत् इसलिए पैदा हो रही है क्योंकि इस प्रकाश से अनायास ही धातु से [[इलेक्ट्रॉन]] उत्सर्जित होते हैं। अगले ही साल, १९०२ में, [[फिलिप लेनार्ड]] ने पाया कि प्रकाश अगर बड़े तरंगदैर्घ्य का हो तो ऐसा नहीं होता, चाहे रोशनी कितनी ही अधिक क्यों न डाली जाए, जबकि छोटे तरंगदैर्घ्य वाले हलकी रोशनी में भी यह होता है। इसे [[प्रकाश-विद्युत प्रभाव|प्रकाश विद्युत प्रभाव]] कहा जाने लगा और वैज्ञानिक कई वर्षों तक यह समझने में नाकाम रहे कि ऐसा क्यों होता है और कम तरंगदैर्घ्य वाले प्रकाश से ही क्यों होता है। आइनस्टाइन ने प्लांक के सिद्धांत को लेकर यह गुत्थी सुलझा दी। उन्होंने कहा कि वास्तव में प्रकाश को उसके कणों के रूप में देखा जा सकता है। प्रकाश के हर कण में प्लांक कि बताई हुई उर्जा होती है, यानि E=hv। तरंगदैर्घ्य और आवृत्ति में उल्टा रिश्ता होता है - बड़े तरंगदैर्घ्य का मतलब है के प्रकाश के कणों में आवृत्ति (v) कम होगी और प्लांक नियम के अनुसार उर्जा भी कम होगी। कम तरंगदैर्घ्य का मतलब है के प्रकाश के कणों में आवृत्ति (v) अधिक होगी और प्लांक नियम के अनुसार उर्जा भी अधिक होगी। उन्होंने इस आधार पर कुछ भविष्यवाणियाँ करीं जो प्रयोगशाला में बिलकुल ठीक पाई गयीं। इसके लिए आइनस्टाइन को १९२१ में भौतिकी का [[नोबेल पुरस्कार]] दिया गया। <ref name="Ref_s">{{Cite web |url=http://nobelprize.org/nobel_prizes/physics/laureates/1921/index.html |title=भौतिकी का नोबेल पुरस्कार १९२१ |access-date=12 मई 2011 |archive-url=https://web.archive.org/web/20081017151250/http://nobelprize.org/nobel_prizes/physics/laureates/1921/index.html |archive-date=17 अक्तूबर 2008 |url-status=live }}</ref> मैक्स प्लांक को उस से भी पहले, १९१८ में, भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया। आइनस्टाइन की खोज के बाद यह झुठलाना असंभव हो गया के प्रकाश में कण और तरंग दोनों की प्रवृतियाँ हैं। १९२५ के बाद प्रकाश के कणों को [[फोटॉन|फ़ोटोन]] बुलाया जाने लगा और यह नाम अब प्रचलित हो चुका है।
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