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== लेखकी == एक बार 'मधुरा वाणी' नाम की मैसूर पत्रिका में एक कथा स्पर्धा व्यवस्तापिथ किया गया समय में तिरुमलम्बा ने अपनी एक कहानी को बेचा. इतनी सुंदर कहानी के लेखक को खोजते हुए स्वयं "मधुरा वाणी" के संपादक श्री के. हनुमान तिरुमलम्बा के घर आ गए. वह पर उनको अनेक लेखन से भरा एक खलिहान मिला. इनमे "विद्व कर्त्तव्य" नाम का लेखन से प्रभावित होकर, उन्होंने उस लेखन को अपने "मधुरा वाणी" में प्रकाशित करदिया. उस समय का रीती रिवाजों के प्रति न होने के कारण तिरुमलम्बा को अनेक छिद्रान्वेषण मिले जिनके बारे में ना सोचते हुए आत्मविश्वास से, अपने खुद की सोच को मानते हुए काम करते गए. इसके लिए उनके माता पिता का आशीर्वाद एवं सहारा मिला. आगे चलकर तिरुमलम्बा ने "सती हितैषिणी" नाम का प्रकाशन घर प्रारंभ किया.
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