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===नरसीला जी की ध्योती की शादी की घटना=== बेटी नरसीला की भेली चढ़ाय। चालो पिता तेरी ध्योती का व्याह ॥ ६७ ॥ मैं निर्धन भिखारी नहीं मेरै दाम। आऊंगा बेटी मैं सुमरुन्गा राम ॥ ६८ ॥ नरसीला खाली गये पल्ला झार। आगे खरी एक समधनि उजार ॥ ६९ ॥ भातई आये हैं जो धी के पिता। करुवे के घाल्या जु हम कूं बता ॥ ७० ॥ समधनि कहै सखियों मैं सुनाय। दो भाठे घाले हैं करुवे पिताय ॥ ७१ ॥ नरसीला सुनि कर जो हुये आधीन। लज्जा राखो मेरे साहिब प्रबीन ॥ ७२ ॥ आये विश्वम्भर जो गाडे लदाय। ल्याये माल मुक्ता जो कीन्ही सहाय ॥ ७३ ॥ सुहे जरीबाब मसरू अपार। गहना सुनहरी और मोती हजार ॥ ७४ ॥ हीरे हरी भांति लाली सुरंग। चाहै सु देवै छुटी धार गंग ॥ ७५ ॥ नगदी और जिनसी खजानें मौहर। उतरैं जरीबाब झीनी दौहर ॥ ७६ ॥ चुन्नरी चिदानन्द ल्याये अनूप। झालर किनारी जरीदार सरूप ॥ ७७ ॥ समधनि सुलखनी खरी है जु पास। भरे भात नरसी जो हीर्यों निवास ॥ ७८ ॥ घोरे तुरंगम दिये हैं जो दान। अरथ बहल पालकी किये हैं कुर्बान ॥ ७९ ॥ कलंगी रु झब्बे सुनहरी हमेल। हीरे जड़ाऊँ मोती रंगरेल ॥ ८० ॥ नरसी अरसी है समुद्र में सिर। गैबी खजाने अमाने जो चीर ॥ ८१ ॥ भाठे परे दोय धूं धूं धमाक। देखें दुनी चिश्म खौलै जो आंख ॥ ८२ ॥ चांदी सोने के हैं भाठे जु दोय। समधनि लिया मुख उलटाई गोय ॥ ८३ ॥ भेली – गुड की डली (शगुन के तोर पर दी जाती थी। जैसे आज कल कार्ड के साथ मिठाई का डिब्बा देते है।) समधनि – कुडमनी (बेटी/बेटे की साँस) भातई – मामा भात – नानकशक (लड़की या लड़के के विवाह में नाना / मामा की तरफ से दि जाने वाली सामग्री) करुवे – कन्यादान भाठे – मिट्टी के ठेले या बर्तन, एक समय नरसिंह की ध्योती की शादी थी। नरसिंह की लड़की उन्हें शगुन के तोर पर गुड देते हुए बोली की पिता जी आप ने शादी में जरुर आना है। नरसिंह बहुत गरीब थे उन्होंने कहा की बेटी मेरे पास तो शादी में देने के लिये कुछ भी नहीं है। मैं आ जाऊंगा लेकिन भगवान का नाम ही लूँगा। जब नरसिंह जी ध्योती की शादी में पहुंचे तो किसी स्त्री ने उन की समधनि ने पूछा की लड़की के मामा और नाना में आये है, उन्होंने कन्यादान में क्या दिया है। आगे से समधनि ने मजाक में कह दिया की दो भाठे दिये हैं। यह सुन कर नरसिंह शर्मिंदा हो गये और भगवान को याद कर उन्हें उसकी इज्जत बचाने को कहने लगे। तभी भगवान बैल गाडी लाद कर सामान की लाए। भगवान लड़की के लिये लाल सूट, चुनरी, विवाह की सारी जरी (कपडे), गहना, मोती, हीरे, घोड़े, पालकी तथा अनेक तरह के उपहार ले कर आए। नरसिंह जी ने खुशी खुशी भात (नानकशक) दिया। तभी दोनों भाठे धूं धूं कर टूट गये और सभी देख कर हैरान रह गये की दोनों भाठे सोने और चांदी से भरे थे। और इस तरह भगवान ने अपार सामग्री देकर अपने प्रिय भगत नरसिंह की लाज रख ली।
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