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== सर्प मणि == कुछ दैवी साँपों के मस्तिष्क पर मणि होती है। मणि अमूल्य होती है। हमें भी जीवन में अमूल्य वस्तुओं को (बातों को) मस्तिष्क पर चढ़ाना चाहिए। समाज के मुकुटमणि जैसे महापुरुषों का स्थान हमारे मस्तिष्क पर होना चाहिए। हमें प्रेम से उनकी पालकी उठानी चाहिए और उनके विचारों के अनुसार हमारे जीवन का निर्माण करने का अहर्निश प्रयत्न करना चाहिए।<ref>{{Cite web|url=http://hindi.webdunia.com/my-blog/nag-history-119080500025_1.html|title=नागपंचमी : नागवंश का इतिहास और नाग पूजा। Nag panchami|last=वर्मा 'दृष्टि'|first=संजय|website=hindi.webdunia.com|language=hi|access-date=2020-07-24|archive-url=https://web.archive.org/web/20200510131958/https://hindi.webdunia.com/my-blog/nag-history-119080500025_1.html|archive-date=10 मई 2020|url-status=dead}}</ref> सर्व विद्याओं में मणिरूप जो अध्यात्म विद्या है, उसके लिए हमारे जीवन में अनोखा आकर्षण होना चाहिए। आत्मविकास में सहायक न हो, उस ज्ञान को ज्ञान कैसे कहा जा सकता है? साँप बिल में रहता है और अधिकांशतः एकान्त का सेवन करता है। इसलिए मुमुक्षु को जनसमूह को टालना चाहिए। इस बारे में साँप का उदाहरण दिया जाता है। देव-दानवों द्वारा किए गए समुद्र मंथन में साधन रूप बनकर वासुकी नाग ने दुर्जनों के लिए भी प्रभु कार्य में निमित्त बनने का मार्ग खुला कर दिया है। दुर्जन मानव भी यदि सच्चे मार्ग पर आए तो वह सांस्कृतिक कार्य में अपना बहुत बड़ा योग दे सकता है और दुर्बलता सतत खटकती रहने पर ऐसे मानव को अपने किए हुए सत्कार्य के लिए ज्यादा घमंड भी निर्माण नहीं होगा।<ref>{{Cite web|url=http://hindi.webdunia.com/sanatan-dharma-article/secret-fo-gem-114101000019_1.html|title=रहस्यमयी 10 मणियां, जानिए कौन-सी|last=जोशी 'शतायु'|first=अनिरुद्ध|website=hindi.webdunia.com|language=hi|access-date=2020-07-25|archive-url=https://web.archive.org/web/20190702182809/http://hindi.webdunia.com/sanatan-dharma-article/secret-fo-gem-114101000019_1.html|archive-date=2 जुलाई 2019|url-status=dead}}</ref> दुर्जन भी यदि भगवद् कार्य में जुड़ जाए तो प्रभु भी उसको स्वीकार करते हैं, इस बात का समर्थन शिव ने साँप को अपने गले में रखकर और विष्णु ने शेष-शयन करके किया है। समग्र सृष्टि के हित के लिए बरसते बरसात के कारण निर्वासित हुआ साँप जब हमारे घर में अतिथि बनकर आता है तब उसे आश्रय देकर कृतज्ञ बुद्धि से उसका पूजन करना हमारा कर्त्तव्य हो जाता है। इस तरह नाग पंचमी का उत्सव श्रावण महीने में ही रखकर हमारे ऋषियों ने बहुत ही औचित्य दिखाया है।
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