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बेनेदेत्तो क्रोचे का अभिव्यंजनावाद
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== सहजानुभूति और अन्य मानसिक व्यापार == क्रोचे के सौंदर्य-दर्शन में केन्द्रीय तत्त्व है सहज-ज्ञान। उन्होंने पूर्ववर्ती इस धारणा का खण्डन किया कि बिना बुद्धि के सहज-ज्ञान सम्भव नहीं। सच तो यह है कि बौद्धिक तत्त्व भी सहज-ज्ञान में घुल-मिलकर उसी का रूप ग्रहण कर लेते हैं। इसी प्रकार सहज ज्ञान और प्रत्यक्ष ज्ञान में भी भेद है। प्रत्यक्ष-ज्ञान का सम्बन्ध वास्तविक-अवास्तविक तथा देश-काल में रहता है, जबकि सहज-ज्ञान इनका भेद नहीं करता। सहज-ज्ञान की सीमा प्रत्यक्ष वस्तुओं तक ही नहीं अपितु दिशा और काल की परिधि से भी आगे तक स्पष्ट है। सहज-ज्ञान और संवेदना में भी स्पष्ट अन्तर है, क्योंकि संवेदनाएँ (Sensation) समुचित बिम्ब अर्थात् रूप (मूर्ति) की सृष्टि नहीं कर पातीं, वह सहज-ज्ञान नहीं समझी जा सकतीं। सहज-ज्ञान प्रभावों की सक्रिय अभिव्यंजना है, जबकि संवेदना यांत्रिकता है, निष्क्रियता है। अतः सहजानुभूति ही अभिव्यंजना है। स्कॉट जेम्स का कथन है कि ‘‘क्रोचे के दर्शन के अनुसार कला कुछ नहीं, सहजानुभूति अथवा मानव-प्रभावों की अभिव्यक्ति है।’’ इस प्रकार सहज ज्ञान अन्य मानसिक व्यापारों से भिन्न है।
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