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=== मनोहर कहानियाँ === एक संपादक के रूप में भैरव प्रसाद गुप्त ने अपने कैरियर की शुरुआत सन् 1944 में मित्र प्रकाशन की पत्रिकाओं -- 'माया' एवं 'मनोहर कहानियाँ' के संपादकीय विभाग में कार्य करने से किया। उन्होंने 'माया' के संपादकीय विभाग में काम किया और 'मनोहर कहानियाँ' का संपादन किया। 1953 ई० तक वे वहाँ रहे। इसके बाद अपने दूसरे दौर में भी सन '75 से '80 के बीच उन्होंने इसके संपादकीय विभाग में कार्य किया। जिस समय गुप्त जी इस विभाग से जुड़े उस समय 'माया' और 'मनोहर कहानियाँ' मूलतः मनोरंजनधर्मा हल्की-फुल्की कहानियों की पत्रिकाएँ थीं जिनका गंभीर और सुरुचि संपन्न पाठकों के बीच कोई मान नहीं था। गुप्त जी ने [[प्रेमचंद|प्रेमचन्द]] के एक संबंधी राजेश्वर प्रसाद सिंह के साथ मिलकर संपादन करते हुए इन पत्रिकाओं की प्रकृति ही बदल डाली। हिन्दी के प्रायः सभी महत्वपूर्ण कहानीकारों को उन्होंने इनसे जोड़ा और महत्वपूर्ण विदेशी कहानियों के अनुवाद की शुरुआत की। उनका अपना पहला उपन्यास 'शोले' भी धारावाहिक रूप से मनोहर कहानियाँ में ही प्रकाशित हुआ था और छह महीने में ही पत्रिका का सर्कुलेशन दुगुना हो गया था।<ref>भैरव प्रसाद गुप्त (विनिबंध), [[मधुरेश]], साहित्य अकादमी, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण-2000, पृष्ठ-73.</ref> उनके इसके संपादन से अलग रहने के समय (सन् 1973 में) अधिक व्यावसायिक लाभ की दृष्टि से 'मनोहर कहानियाँ' को सत्य कथाओं पर केंद्रित कर दिया गया।<ref>भारतीय पत्रकारिता कोश, खण्ड-2, विजयदत्त श्रीधर, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, संस्करण-2010, पृष्ठ-1035.</ref>
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