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=== हल्दीघाटी का युद्ध === {{main|हल्दीघाटी का युद्ध}} [[चित्र:Chokha, Battle of Haldighati, painted 1822, detail.jpg|अंगूठाकार|291x291px|left|[[हल्दीघाटी का युद्ध|हल्दीघाटी के युद्ध]] में लड़ते हुए महाराणा।]] यह युद्ध 18 जून 1576 ईस्वी में मेवाड़ तथा मुगलों के मध्य हुआ था। इस युद्ध में मेवाड़ की सेना का नेतृत्व महाराणा प्रताप ने किया था। भील सेना के सरदार राणा पूंजा भील थे। इस युद्ध में महाराणा प्रताप की तरफ से लड़ने वाले एकमात्र मुस्लिम सरदार थे'''''-''''' [[हकीम खाँ सूरी]]।<ref>{{Cite web|url=https://aajtak.intoday.in/education/story/know-about-haldighati-war-and-maharana-pratap-bravery-stories-tedu-1-1010212.html|title=4 घंटे की लड़ाई थी हल्दीघाटी, राणा ने की थी मुगलों की हालत पतली|website=aajtak.intoday.in|language=hi|access-date=2020-05-27|archive-url=https://web.archive.org/web/20180618102121/https://aajtak.intoday.in/education/story/know-about-haldighati-war-and-maharana-pratap-bravery-stories-tedu-1-1010212.html|archive-date=18 जून 2018|url-status=live}}</ref> लड़ाई का स्थल राजस्थान के गोगुन्दा के पास हल्दीघाटी में एक संकरा पहाड़ी दर्रा था। महाराणा प्रताप ने लगभग 3,000 घुड़सवारों और 400 भील धनुर्धारियों के बल को मैदान में उतारा। मुगलों का नेतृत्व [[राजा मान सिंह|आमेर के राजा मान सिंह]] ने किया था, जिन्होंने लगभग 5,000-10,000 लोगों की सेना की कमान संभाली थी। तीन घण्टे से अधिक समय तक चले भयंकर युद्ध के बाद, [[महाराणा प्रताप]] ने खुद को जख्मी पाया जबकि उनके कुछ लोगों ने उन्हें समय दिया, वे पहाड़ियों से भागने में सफल रहे और एक और दिन लड़ने के लिए जीवित रहे। मेवाड़ के हताहतों की संख्या लगभग 1,600 पुरुषों की थी।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=qoRDAAAAYAAJ|title=Military History of India|last=Sarkar|first=Sir Jadunath|date=1960|publisher=Orient Longmans|year=|isbn=978-0-86125-155-1|location=|pages=|language=en|author-link=यदुनाथ सरकार}}</ref> मुगल सेना ने 3500-7800 लोगों को खो दिया, जिसमें 350 अन्य घायल हो गए। इसका कोई नतीजा नही निकला जबकि वे(मुगल) गोगुन्दा और आस-पास के क्षेत्रों पर कब्जा करने में सक्षम थे, वे लंबे समय तक उन पर पकड़ बनाने में असमर्थ थे। जैसे ही साम्राज्य का ध्यान कहीं और स्थानांतरित हुआ, [[महाराणा प्रताप|प्रताप]] और उनकी सेना बाहर आ गई और अपने प्रभुत्व के पश्चिमी क्षेत्रों को हटा लिया।<ref>{{Cite web|url=https://web.archive.org/web/20170913231208/http://persian.packhum.org/persian/main?url=pf?file=00701023&ct=67|title=Wayback Machine|last=|first=|date=2017-09-13|website=web.archive.org|archive-url=https://persian.packhum.org/persian/main?url=pf%3Ffile%3D00701023%26ct%3D67|archive-date=2017-09-13|dead-url=|access-date=2020-12-12}}</ref> इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व मानसिंह तथा आसफ खाँ ने किया। इस युद्ध का आँखों देखा वर्णन अब्दुल कादिर बदायूनीं ने किया। इस युद्ध को आसफ खाँ ने अप्रत्यक्ष रूप से जेहाद की संज्ञा दी। इस युद्ध मे [[राणा पूंजा]] [[भील]] का महत्वपूर्ण योगदान रहा। इस युद्ध में बींदा के झालामान ने अपने प्राणों का बलिदान करके महाराणा प्रताप के जीवन की रक्षा की। वहीं ग्वालियर नरेश 'राजा रामशाह तोमर' भी अपने तीन पुत्रों 'कुँवर शालीवाहन', 'कुँवर भवानी सिंह 'कुँवर प्रताप सिंह' और पौत्र बलभद्र सिंह एवं सैकडों वीर तोमर राजपूत योद्धाओं समेत चिरनिद्रा में सो गया।<ref>{{Cite book|url=https://books.google.co.in/books/about/Maharana_Pratap.html?id=K0UnRk-rRa4C|title=Maharana Pratap|last=Rana|first=Bhawan Singh|date=2005|publisher=Diamond Pocket Books (P) Ltd.|year=|isbn=978-81-288-0825-8|location=|pages=67-71|language=en}}</ref> इतिहासकार मानते हैं कि इस युद्ध में कोई विजय नहीं हुआ। पर देखा जाए तो इस युद्ध में महाराणा प्रताप सिंह विजय हुए। अकबर की विशाल सेना के सामने मुट्ठीभर राजपूत कितनी देर तक टिक पाते, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ, ये युद्ध पूरे एक दिन चला ओेैर राजपूतों ने मुग़लों के छक्के छुड़ा दिया थे और सबसे बड़ी बात यह है कि युद्ध आमने सामने लड़ा गया था। महाराणा की सेना ने मुगलों की सेना को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया था और मुगल सेना भागने लग गयी थी।<ref>{{Cite web|url=https://news.jagatgururampalji.org/maharana-pratap-jayanti-2020-death-history/|title=Maharana Pratap Jayanti 2020 Hindi: Biography, Death, History|date=2020-05-21|website=S A NEWS|language=en-US|access-date=2020-05-27}}</ref>
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