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== धर्म में प्रमाण का निर्देश == (1) इस दर्शन के प्रथमाध्याय में धर्मप्रमाणों का निरूपण किया गया है और विधि, अर्थवाद मंत, स्मृति, शिष्टाचार, नामधेय, संदिग्धार्थ निर्णायक वाक्यशेष और सामथ्र्य का निरूपण किया गया है। (2) द्वितीयाध्याय में शब्दांतर, अभ्यास, संख्या, संज्ञा, गुण और प्रकरणांतर, ये छह कर्म भेद के प्रमाण हैं। (3) तृतीयाध्याय में श्रुति, लिंग, वाक्य, प्रकरण, स्थान और समाख्या ये छ: विनियोजक (अंगता बोधक) प्रमाण हैं। (4) चतुर्थाध्याय में, श्रुति अर्थ, पाठ, स्थान, मुख्य और प्रवृत्ति में छह बोधक प्रमाण हैं (5) पंचमाध्याय में अतिदेश, प्रत्यक्षवचनातिदेश, नामातिदेश, कल्पित वचनातिदेश, आश्रयातिदेश और स्थानापत्ति अतिदेश ये सात प्रकार के अतिदेश हैं। अंत के दो भेद सप्तमअध्याय में वर्णित नहीं हैं। ये इंद्रिय कामाधिकरण तथा स्थानापत्ति अतिदेश में निरूपित हैं। (6) नवम अध्याय में मंत्रोह, सामोह और संस्कारोह के भेद से तीन प्रकार के "ऊह" का निरूपण है। (7) दशमाध्याय में अर्थलोप, प्रत्याम्नाय और प्रतिषेध के भेद से तीन प्रकार के बाध का निरूपण हैं। (8) एकादशाध्याय में तंत्र और आवाय का निरूपण है। (9) द्वादशाध्याय में "प्रसंग" का निरूपण है। इस प्रकार एक एक विषय का प्रतिपादन द्वादशाध्यायात्मक मीमांसा दर्शन में किया गया है जिसे "द्वादशलक्षणी" भी कहा गया है। यहाँ लक्षण शब्द अध्यायवाचक है। इसको दो प्रकार से विभक्त किया गया है जिसे उपदेश और अतिदेश कहते हैं। प्रथम (पूर्व षट्क) अध्यायों में उपदेश का विवेचन है। द्वितीय (उत्तर षट्क) के छह अध्यायों में अतिदेश का विवेचन है। उक्त उपदेश अतिदेश द्वय विचारात्मक शास्त्र है। शास्त्र दीपिकाकार पार्थसारथि मिश्र के अनुसार उपदेश विचार के अनंतर अतिदेश विचार का आरंभ होता है। वर्तमान काल में उपलब्ध मीमांसा दर्शन में द्वादश अध्याय हैं। प्रत्येक अध्याय में चार पाद होते हैं, किंतु तृतीय, षष्ठ और दशम अध्यायों में आठ आठ पाद हैं, जिसे "शबरा" अध्याय भी कहते हैं। इस तरह संपूर्ण ग्रंथ में साठ पाद हैं। इस दर्शन की सूत्रसंख्या में विवाद है। किसी के मत में दो सहस्र छह सौ बावन (2652), किसी के मत में दो सहस्र सात सौ बयालीस (2742) सूत्र हैं। उपर्युक्त वर्णन "ऐसेकित" की "कर्ममीमांसा" नामक पुस्तक पृष्ठ चार में प्रतिपादित है। आनंद आश्रम पूना से प्रकाशित "न्यायमाला" में दो सहस्र सात सौ पैंतालीस (2745) सूत्रों का प्रतिपादन है। इसी प्रकार कुछ व्यक्तियों के मत से अधिकरण संख्या नौ सौ सात (907) प्राप्त होती है। कुछ के मत से नौ सौ पंद्रह (915) सूत्र हैं। किंतु "मीमांसासार संग्रह" के कर्ता शंकर भट्ट के अनुसार "पूर्वषट्क" में पाँच सौ तीस, (530) उत्तरषट्क में चार सौ सत्तर (470) सूत्र हैं। इस प्रकार संपूर्ण अधिकरण एक सहस्र संख्या में विभाजित है। : ''नत्वागणेश-वाग्राम-गुर्वड्.ध्रीन् भट्टशंकर:। : ''सहस्रं वक्ति सिद्धांतान् सार्धश्लोक शतद्वयान्॥ उपर्युक्त श्लोक के अनुसार अधिकरणों की संख्या एक सहस्र दो सौ पचास (1250) है।
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