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==पूर्वशास्त्रीय काल (500 ईसा पूर्व से 200 ईसा पूर्व तक)== [[उपनिषद|उपनिषदों]], [[महाभारत]] और [[भगवद्गीता]] में योग के बारे में बहुत चर्चा हुई है। भगवद्गीता में ज्ञान योग, भक्ति योग, कर्म योग और राज योग का उल्लेख है। गीतोपदेश में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं अर्जुन को योग का महत्व बताते हुए कर्मयोग, भक्तियोग व ज्ञानयोग का वर्णन करते हैं। गीता के चौथे अध्याय के पहले श्लोक में कृष्ण अर्जुन से कहते हैं- : ''इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्। : ''विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्॥ ४.१ अर्थात् हे अर्जुन मैने इस अविनाशी योग को [[सूर्य]] से कहा था , सूर्य ने अपने पुत्र [[वैवस्वत मनु]] से कहा और मनु ने अपने पुत्र राजा [[इक्ष्वाकु]] से कहा। इस अवधि में योग, [[श्वसन]] एवं [[मुद्रा]] सम्बंधी अभ्यास न होकर एक जीवनशैली बन गया था। उपनिषद् में इसके पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध हैं। [[कठ उपनिषद्|कठोपनिषद]] में इसके लक्षण को बताया गया है- : ''तां योगमित्तिमन्यन्ते स्थिरोमिन्द्रिय धारणम्'' जैन और बौद्ध जागरण और उत्थान काल के दौर में [[यम]] और [[नियम]] के अंगों पर जोर दिया जाने लगा। यम और नियम अर्थात अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, अस्तेय, अपरिग्रह, शौच, संतोष, तप और स्वाध्याय का प्रचलन ही अधिक रहा। यहाँ तक योग को सुव्यवस्थित रूप नहीं दिया गया था। 563 से 200 ई.पू. योग के तीन अंग - तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान - का प्रचलन था। इसे 'क्रियायोग' कहा जाता है। प्रसिद्ध संवाद, “योग याज्ञवल्क्य” में, जोकि [[बृहदारण्यक उपनिषद]] में वर्णित है, में [[याज्ञवल्क्य]] और [[गार्गी]] के बीच कई साँस लेने सम्बन्धी व्यायाम, शरीर की सफाई के लिए आसन और ध्यान का उल्लेख है। गार्गी द्वारा [[छांदोग्य उपनिषद]] में भी योगासन के बारे में बात की गई है।
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