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== संक्रामी व्याधियाँ == (१) '''ट्रिकोमोनोस [[योनिशोथ]]''' - यह एक प्रकार का [[फंगस]] है, जो योनि के श्लेष्मल स्तर में संक्रमण करता है। यह शोथ किसी समय किसी भी अवस्था में हो सकता है। इसमें योनिकंडु, सिर दर्द, बेचैनी तथा दाह होता है। योनि में शोथ के लाल चकत्ते हो जाते हैं तथा पीला स्राव होता है। संखिया, वायोफार्म, फ्लोरक्विन आदि की गोलियों को योनि में धारण करने से लाभ है तथा सल्फा और सेंटिबायोटिक गोलियों को भी योनि में धारण किया जाता है। (2) '''योनि का थ्रश (thrush)''' - यह रोग बालिकाओं में अधिक होता है। यह मायकोटिक प्रकार का फंगस उपसर्ग है। योनिपथ में एक सफेद पर्त सी जम जाती है, जिसे हटाने पर दाने दिखाई देते हैं। इस कवक का नाम कैंडिडा अल्वीकेंस है। इस व्याधि में दाह, वेदना, कंडु तथा स्राव होता है। मायकोस्टेटिन सपॉज़िटरी से लाभ होता है। इसी प्रकार हीमोफीलस वैजाइनैल के उपसर्ग से भी योनिशोथ होता है। इसमें टेरामाइसीन से लाभ होता है। (३) '''सपूय योनिशोथ'''- गॉनोकॉकस, स्टैफिलो और स्ट्रेप्टोकॉकस जीवाणुओं के कारण योनिशोथ होता है। इसमें कंडु, दाह, तथा वेदना होती है और पुयस्राव होता है। सल्फा तथा ऐंटिबायोटिक औषधियों से तुरंत लाभ होता है। (4) '''जराजन्य योनिशोथ'''- [[रजोनिवृत्ति]] के पश्चात् एस्ट्रोजेन की कमी से तथा योनि श्लेष्मलकला में रक्त की कमी से, व्रण उत्पन्न होते हैं तथा उपसर्ग के लिये योनि सुग्राही हो जाती है। एस्ट्रोजेन के प्रयोग से लाभ होता है। (5) '''मृदु शेंकर (ब्रण)''' - यह डूक्रे के जीवाणु का उपसर्ग है। यह रतिज रोग है। योनि में रक्त के दाने होते हैं तथा लसिकपर्वी में शोथ उत्पन्न होता है। सल्फा तथा ऐंटिबायोटिक औषधियों से लाभ होता है। (6) '''कठोर शेंकर (ब्रण)''' - यह रतिज उपसर्ग स्काइरोकीटा पेलेडा से होता है। इसे सिफलिस कहते हैं। प्राय: अघुभगोष्ठ तथा कभी कभी योनि में एक दाना दिखाई देता है, जो काफी बड़ा होता है तथा फिर ब्रण में बदल जाता हैं। इसकी चिकित्सा आर्सेनिक एवं पेनिसिलीन से की जाती है।
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