सामग्री पर जाएँ
मुख्य मेन्यू
मुख्य मेन्यू
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
मार्गदर्शन
मुखपृष्ठ
हाल में हुए बदलाव
बेतरतीब पृष्ठ
मीडियाविकि के बारे में सहायता
भारतपीडिया
खोजें
खोजें
दिखावट
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
व्यक्तिगत उपकरण
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
लॉग-आउट किए गए संपादकों के लिए पृष्ठ
अधिक जानें
योगदान
वार्ता
"
रघु वीर
" (अनुभाग) सम्पादित करें
पृष्ठ
चर्चा
हिन्दी
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
उपकरण
उपकरण
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
क्रियाएँ
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
सामान्य
कड़ियाँ
पृष्ठ से जुड़े बदलाव
विशेष पृष्ठ
पृष्ठ की जानकारी
दिखावट
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
चेतावनी:
आपने लॉग-इन नहीं किया हुआ है। अगर आप सम्पादन करते हैं तो इस पृष्ठ के सम्पादन इतिहास में आपका IP पता दृश्य होगा। अगर आप
लॉग-इन
करते हैं या
खाता बनाते हैं
तो दूसरी सुविधाओं के साथ-साथ आपके सम्पादनों का श्रेय आपके सदस्यनाम पर दिया जाएगा।
ऐन्टी-स्पैम जाँच। इसे
नहीं
भरें!
== भाषाविद्, हिन्दीसेवी एवं कोशकार == आप महान् कोशकार तथा भाषाविद् थे। वह केवल हिन्दी भाषा में ही पारंगत नहीं थे वरन [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]], [[फ़ारसी भाषा|फारसी]], [[अरबी]], [[उर्दू भाषा|उर्दू]], [[बाङ्ला भाषा|बांग्ला]], [[मराठी भाषा|मराठी]], [[तमिल]], [[तेलुगू भाषा|तेलगु]], [[पंजाबी]] पर भी उनका अधिकार था। इतना ही नहीं, यूरोप की अधिकांश भाषाओं (जिनमें [[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेजी]] भी शामिल है) पर भी उनकी अच्छी पकड़ थी। <ref>{{Cite web |url=https://differenttruths.com/interviews/profile/dr-raghu-vira-a-forgotten-founding-father-of-india/ |title=Dr Raghu Vira: A Forgotten Founding Father of India |access-date=3 मार्च 2019 |archive-url=https://web.archive.org/web/20190306043131/https://differenttruths.com/interviews/profile/dr-raghu-vira-a-forgotten-founding-father-of-india/ |archive-date=6 मार्च 2019 |url-status=dead }}</ref> जर्मन, अंग्रेजी और हिन्दी की वाक्य-संरचना के अन्तर को उन्होने निम्नलिखित शब्दों में अभिव्यक्त किया है- :''In comparison to German, English sentences are simplicity itself. But in comparison to Hindi, they are a picture of entangled complexity. Piling up of adjectival clauses and phrases, a sentence may show as many as five, eight or even more verbs with absolute constructions intertwined, the subject removed from the verb by a distance which the ordinary human comprehension fails to grasp at the first or even a second reading. English sentences, particularly in legal documents, are such a jumble that only a specially trained mind can wade through them. When one has to translate these, knowing well that anything misplaced or added to, may work incalculable mischief in the law, one tends to be faithful in keeping up the sequence of words and phrases, in keeping the inter-relationship and above all in keeping their hardly intelligible intertwining. This language is barren of all grace although it is a rich field for hair-splitting intellect. Every term or phrase, every collection of words, has a historical background. A case might have been decided upon one of them. There might be, or ordinarily is, a ruling of the Parliament, an important law case judgement which is hung upon a word of the phrase or an idea lying behind them. Thus all canons which are usually applicable to translation of literary works fail here. It is a technique which has to be followed up closely, consistently with utter disregard of charm, beauty or readability.<ref>India's National language by Dr Raghu Vir, page 240</ref> आपने प्रायः छह लाख शब्दों की रचना की है। आपकी शब्दनिर्माण की पद्धति वैज्ञानिक है। आपने विज्ञान की प्रत्येक शाखा के शब्दों की कोश-रचना की है। सन् १९४३ ई. में आपने आंग्ल-हिंदी पारिभाषिक शब्दकोश का प्रणयन और प्रकाशन किया। सन् १९४६ में [[मध्य प्रदेश|मध्यप्रदेश]] सरकार ने आपको [[हिन्दी|हिंदी]] और [[मराठी भाषा|मराठी]] के वैज्ञानिक ग्रंथों की रचना का कार्य सौंपा, जिसे आपने पूर्ण दृढ़ता तथा योग्यता से पूरा किया। अपने राष्ट्रभाषा हिंदी को प्रतिष्ठित करने का आंदोलन ही नहीं किया अपितु उसके आधार को भी पुष्ट और प्रशस्त किया। संविधान की शब्दावली के कारण आपका यश सारे देश में फैल गया था। आप अनेक वर्षों तक [[संसदीय हिंदी परिषद्]] के मंत्री थे। डॉ॰ रघुवीर के कोशकार्य की एक ओर अत्यधिक प्रशंसा हुई, दूसरी ओर अत्यधिक आलोचना। वस्तुत: यह प्रशंसनीय कार्य था, जिसको अत्यधिक श्रम से वैज्ञानिक आधार पर प्रस्तुत किया गया। संपूर्णत: संस्कृत पर आधारित होने के कारण इसकी व्यावहारिकता पर संदेह किया जाने लगा। उन्होंने सर्वप्रथम भाषा-निर्माण में यांत्रिकता तथा वैज्ञानिकता को स्थान दिया। उपसर्ग तथा प्रत्ययों के धातुओँ के योग से लाखों शब्द सहज ही बनाये जा सकते हैं: : ''उपसर्गेण धात्वर्थो बलादन्यत्र नीयते। प्रहार-आहार-संहार-विहार-परिहार वत्॥ इस प्रक्रिया को कोश की भूमिका में समझाया। यदि मात्र दो संभावित योग लें, मूलांश ४०० और तीन प्रत्यय लें तो ८००० रूप बन सकते हैं, जबकि अभी तक मात्र ३४० योगों का उपयोग किया गया है। यहाँ शब्द-निर्माण की अद्भुत क्षमता उद्घाटित होती है। उन्होंने विस्तार से उदाहरण देकर समझाया कि किस प्रकार 'गम्' धातु मात्र से १८० शब्द सहज ही बन जाते हैं- : ''प्रगति, परागति, परिगति, प्रतिगति, अनुमति, अधिगति, अपगति, अतिगति, आगति, अवगति, उपगति, उद्गति, सुगति, संगति, निगति, निर्गति, विगति, दुर्गति, अवगति, अभिगति, गति, गन्तव्य, गम्य, गमनीय, गमक, जंगम, गम्यमान, गत्वर, गमनिका आदि कुछ उदाहरण हैं। मात्र 'इ' धातु के साथ विभिन्न एक अथवा दो उपसर्ग जोड़कर १०७ शब्दों का निर्माण संभव है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ५२० धातुओं के साथ २० उपसर्गों तथा ८० प्रत्ययों के योग से लाखों शब्दों का निर्माण किया जा सकता है। अगर धातुओं की संख्या बढ़ा ली जाए तो १७०० धातुओं से २३८०० मौलिक तथा ८४,९६,२४००० शब्दों को व्युत्पन्न किया जा सकता है। इस प्रकार '''संस्कृत में शब्द निर्माण की अद्भुत क्षमता है''', जिसका अभी नाममात्र का ही उपयोग किया जा सका है। अतिवादी दृष्टि से बचकर भी लाखों ऐसे सरल शब्दों को प्रयोग में लाया जा सकता है, जो हिन्दी की प्रवृत्ति के अनुकूल हैं।
सारांश:
भारतपीडिया पर किया कोई भी योगदान अन्य सदस्यों द्वारा बदला जा सकता है और हटाया भी जा सकता है। अगर आपको अपने लिखे हुए पाठ में संपादन होना नामंजूर है तो यहाँ पर न लिखें।
आप हमें यह भी वचन देतें हैं कि यह आपने स्वयं लिखा है अथवा सार्वजनिक क्षेत्र या किसी समान मुक्त स्रोत से प्रतिलिपित किया है (अधिक जानकारी के लिये
भारतपीडिया:कॉपीराइट
देखें)।
कॉपीराइट सुरक्षित कार्यों को बिना अनुमति के यहाँ न डालें!
रद्द करें
सम्पादन सहायता
(नए विंडो में खुलता है)