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राजा गिरधरदास खण्डेला
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==निधन== राजा बनने के 9 महीनॉन बाद ही बुरहानपुर में सैय्यद कबीर के आकस्मिक आक्रमण का प्रतिरोध करते हुए अपने 26 साथी सैनिकों के साथ वीरगति को प्राप्त हुए। विक्रमी संवत 1680 की पौष बदी पंचमी के दिन दक्षिण के बक्शी अकीदत खां की अरजी से बादशाह जहाँगीर को गिरधरदास के मारे जाने की सूचना मिली। तब जहांगीर ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण गंभीरतम घटना मानते हुए अपनी दिनचर्या की पुस्तक "तुजुक" में उसका सविस्तार उल्लेख किया। राजा गिरधरदास के निधन के बाद उनके पुत्र द्वारकादास खण्डेला की गद्दी पर बैठे।2
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