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== स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान == [[भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन|भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन]] में उनका पदार्पण वक़ील के रूप में अपने कैरियर की शुरुआत करते ही हो गया था। [[चम्पारण सत्याग्रह|चम्पारण]] में गान्धीजी ने एक तथ्य अन्वेषण समूह भेजे जाते समय उनसे अपने स्वयंसेवकों के साथ आने का अनुरोध किया था। राजेन्द्र बाबू [[महात्मा गांधी|महात्मा गाँधी]] की निष्ठा, समर्पण एवं साहस से बहुत प्रभावित हुए और 1921 में उन्होंने [[कलकत्ता विश्वविद्यालय|कोलकाता विश्वविद्यालय]] के सीनेटर का पदत्याग कर दिया। गाँधीजी ने जब विदेशी संस्थाओं के बहिष्कार की अपील की थी तो उन्होंने अपने पुत्र मृत्युंजय प्रसाद, जो एक अत्यंत मेधावी छात्र थे, उन्हें [[कलकत्ता विश्वविद्यालय|कोलकाता विश्वविद्यालय]] से हटाकर बिहार विद्यापीठ में दाखिल करवाया था। उन्होंने 'सर्चलाईट' और 'देश' जैसी पत्रिकाओं में इस विषय पर बहुत से लेख लिखे थे और इन अखबारों के लिए अक्सर वे धन जुटाने का काम भी करते थे। 1914 में [[बिहार]] और [[बंगाल]] मे आई [[बाढ़]] में उन्होंने काफी बढ़चढ़ कर सेवा-कार्य किया था। [[बिहार]] के 1934 के [[भूकम्प|भूकंप]] के समय राजेन्द्र बाबू कारावास में थे। जेल से दो वर्ष में छूटने के पश्चात वे भूकम्प पीड़ितों के लिए धन जुटाने में तन-मन से जुट गये और उन्होंने वायसराय के जुटाये धन से कहीं अधिक अपने व्यक्तिगत प्रयासों से जमा किया। [[सिंध]] और [[क्वेटा]] के भूकम्प के समय भी उन्होंने कई राहत-शिविरों का इंतजाम अपने हाथों मे लिया था। 1934 में वे [[भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस]] के [[मुम्बई|मुंबई]] अधिवेशन में अध्यक्ष चुने गये। [[सुभाष चन्द्र बोस|नेताजी सुभाषचंद्र बोस]] के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देने पर कांग्रेस अध्यक्ष का पदभार उन्होंने एक बार पुन: 1939 में सँभाला था। भारत के स्वतन्त्र होने के बाद [[भारतीय संविधान|संविधान]] लागू होने पर उन्होंने देश के पहले राष्ट्रपति का पदभार सँभाला। राष्ट्रपति के तौर पर उन्होंने कभी भी अपने संवैधानिक अधिकारों में [[प्रधानमन्त्री|प्रधानमंत्री]] या कांTग्रेस को दखलअंदाजी का मौका नहीं दिया और हमेशा स्वतन्त्र रूप से कार्य करते रहे। हिन्दू अधिनियम पारित करते समय उन्होंने काफी कड़ा रुख अपनाया था। राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने कई ऐसे दृष्टान्त छोड़े जो बाद में उनके परवर्तियों के लिए उदाहरण बन गए। [[भारत का संविधान|भारतीय संविधान]] के लागू होने से एक दिन पहले 25 जनवरी 1950 को उनकी बहन भगवती देवी का निधन हो गया, लेकिन वे भारतीय गणराज्य के स्थापना की रस्म के बाद ही [[अन्त्येष्टि क्रिया|दाह संस्कार]] में भाग लेने गये। 12 वर्षों तक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करने के पश्चात उन्होंने 1962 में अपने अवकाश की घोषणा की। अवकाश ले लेने के बाद ही उन्हें [[भारत सरकार]] द्वारा सर्वोच्च नागरिक सम्मान [[भारत रत्न|भारत रत्न]] से नवाज़ा गया।
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