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==कार्य जीवन== भारत में पढ़ाई के क्रम में ही दर्नाल ने [[कोलकाता]] में स्थित एक रिकॉर्डिंग कंपनी में अपने काम की शुरुआत की, जहाँ [[धर्मराज थापा]], [[नातिकाजी]], [[शिव शंकर]] और [[तारादेवी श्रेष्ठ]] जैसे नेपाली संगीतकारों से उनकी पहचान हुई। 1958 में दर्नाल अपने साथ नेपाल में मैंडोलिन लाए। ख़ासकर उन्हें नेपाल में पश्चिमी वाद्य-यंत्रों की पहचान और लोकप्रियता का श्रेय दिया जाता है। अपने कार्य संपर्क बढ़ाते हुए उनहोंने 1959 में [[नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान]] में मैंडोलिन वादक के पद में नौकरी की। पाँच साल बाद उन्हें [[महेन्द्र वीर विक्रम शाह|महेंद्र वीर विक्रम शाह]] द्वारा लाई गई त्रिवर्षीय योजना के अंतर्गत नेपाल संगीत और नृत्य अकादमी में सचिव के पद में नियुक्त किया गया। 1966 में [[केदारमान व्यथित]] ने उन्हें नौकरी से निकाल देने के बावजूद [[सूर्य विक्रम ज्ञवाली]] के सिफ़ारिश में उन्हें 2004 तक वहीं काम करने का मौका मिला। लोक संगीत के क्षेत्र में दर्नाल के योगदान प्रशंसनीय हैं ही लेकिन [[पुष्कल बूढ़ापृथी]] के निदेशन अनुसार नेपाल में पश्चिमी बाजाओं के लोकप्रियता में पहुँचाए योगदान भी काम नहीं हैं। गीत-लेखन, गायन और वादन के क्षेत्रों में उनके अत्यावश्यक कार्यों के वजह से उन्हें एक सांस्कृतिक हस्ती माना जाता है।<ref name="RSD3"/><ref name="yalambartimes">{{cite web|url= http://yalambartimes.com/?p=448 |title=सङ्गीतका शिखर पुरुष रामशरण|trans-title= संगीत के शिखर पुरुष रामशरण|first=रमेश|last=खाती|website= यलंबर टाइम्ज़|access-date=16 मार्च 2019}}</ref> प्रज्ञा प्रतिष्ठान में दर्नाल संगीत संग्रहालय के एकमात्र प्रभारी थे, जो 2500 साल पहले बुद्ध के समय में बजाई जानेवाली क्वताः सहित 127 वाद्य-यंत्रों का भंडार था।<ref name="Bimochan">{{Citation|last= पौड्याल|first= बरी|title=प्राज्ञिक धरातलको निर्माण|trans-title=प्राज्ञिक धरातल का निर्माण|journal=विमोचन|volume=13|issue=7|date=सितंबर 1994}}</ref> 35 साल के लिए नोटेशनकार के पद में काम करने के बाद दर्नाल प्रतिष्ठान से सेवानिवृत्त हो गए।<ref name="Kantipur">{{Citation|last= भट्टराई|first=देवेंद्र|title=मुर्चुङ्गाजस्तो जिन्दगी|trans-title=मुर्चुंगा जैसी ज़िंदगी|publisher=कांतिपुर|date=13 अप्रैल 2002}}</ref><ref name="Annapurna">{{citation|title=अर्कै लोकको आभास|trans-title=दूसरे लोक का आभास|first=रामकला|last=खड़का|date=17 जनवरी 2004|publisher=अन्नपूर्ण पोस्ट}}</ref> संगीत शिरोमणि [[यज्ञराज शर्मा]] के सिफ़ारिश में रु॰ 150 प्रति महीना की तनख़ा में नियुक्त दर्नाल ने 2009 तक क़रीब 50 साल प्रज्ञा प्रतिष्ठान में बिताए। 2004 से लेकर 2009 तक वे प्रज्ञा-परिषद के सदस्य थे। सेवानिवृत्ति के बाद उनहोंने म्यूज़िक नेपाल में काम किया। वे [[त्रिभुवन विश्वविद्यालय]] संगीत विभाग, नेपाली लोक बाजा संग्रहालय और नेपाल दलित साहित्य एवं सांस्कृतिक अकादमी सहित कई सांस्कृतिक संगठनों में सलाहकार के पद में भी कार्यरत थे। ===गीत रचना=== दार्जिलिंग में अपने प्रवास के दौरान दर्नाल ने [[लक्खी देवी सुंदास]] और [[शिव कुमार राई]] जैसे विद्वानों के संपर्क में संगीत के क्षेत्र में काफ़ी तरक्क़ी की। वे पियानो, ड्रम और गिटार बजाने में माहिर थे। कोलकाता से काठमांडू लौटते वक़्त उनहोंने अपने साथ मैंडोलिन और गिटार सहित कई और वाद्य-यंत्र लाए।<ref name="Kopila">{{Citation|last=वाग्ले|first=अनंत प्रसाद|title=तिलौरी किन्दा हर्जाना तिर्नुपर्यो|trans-title=तिलौरी ख़रीदते वक़्त जुरमाना भरना पड़ा|journal=कोपिला, कांतिपुर|date=13 दिसंबर 1994}}</ref> रामशरण नेपाल में गिटार और मैंडोलिन की पहचान करानेवाले पहले शख़्स थे।<ref name="Saptahik ">{{citation|title=गितार र मेन्डोलिन भित्र्याउने सर्जक|trans-title= गिटार और मैंडोलिन की पहचान करानेवाले सर्जक |first= अशेष |last= मल्ल |date=11 जुलाई 1991|publisher= साप्ताहिक जनमंच}}</ref> उन्हें संगीतकार [[प्रेमध्वज प्रधान]] को गिटार की शिक्षा देने के लिए जाना जाता है।<ref name="RKD">{{citation|title=दुःखद् दशैँ (श्रद्धाञ्जलि)|trans-title= दुःखद दशैं (श्रद्धांजलि) |first= राजकुमार |last= दिक्पाल|date=1 अक्टूबर 2011|publisher= अन्नपूर्ण पोस्ट}}</ref> उन्हें [[ईश्वरबल्लभ]] के कई गानों की संगीत रचना करने का श्रेय दिया गया है। उन्होंने [[माधवप्रसाद घिमिरे]] की "गाउँछ गीत नेपाली" के लिए संगीत तैयार किए थे। [[महेन्द्र वीर विक्रम शाह|एम॰ बी॰ बी॰ शाह]] की "उसका लागि र फेरि उसैका लागि" में नोटेशन भी उन्हों ने ही लिखे थे। लेकिन दर्नाल की संगीतात्मकता की विशुद्ध झलक "हे वीर हिँड अघि सरी" में देखी जा सकती है।<ref name="yalambartimes"/><ref name="Annapurna3 ">{{citation|title= लोकबाजा अन्वेषक र जगदम्बाश्री पुरस्कार|trans-title= वाद्य-यंत्र अन्वेषक और जगदंबाश्री पुरस्कार|first= राई |last= बाला |date=11 सितंबर 2009|publisher= अन्नपूर्ण पोस्ट }}</ref> ===संगीत अन्वीक्षण और लेखन=== {{quote box |quote = "लोक संगीत ही राष्ट्र का प्राण है।"|source= — रामशरण दर्नाल<ref name="Indra ">{{Citation|last=श्रेष्ठ|first=इंद्र कुमार 'सरित'|title="लोकसङ्गीत नै राष्ट्रको प्राण हो," रामशरण दर्नाल|trans-title="लोक संगीत ही राष्ट्र का प्राण है," रामशरण दर्नाल|journal= विवेक|volume=7|issue=4|date=19 अप्रैल 1988}}</ref> |align = right |width = 350px |border = 1px |bgcolor= #FFFFF0 |fontsize = 90% }} {{quote box |quote = "नेपाली संगीत और संस्कृति का रिश्ता नाखून और उँगलियों के रिश्ते जैसे ही गहरा होता है।"|source= — रामशरण दर्नाल<ref name="Chetnath">{{Citation|last=धमला|first=चेतनाथ|title="सङ्गीत र संस्कृति : नङ र मासुजस्तो," रामशरण दर्नाल|trans-title="संगीत और संस्कृति : नाखून और ऊँगली जैसे," रामशरण दर्नाल|journal= नेपाल जागरण साप्ताहिक|volume=11|issue=5|date=2002}}</ref> |align = right |width = 350px |border = 1px |bgcolor= #FFFFF0 |fontsize = 90% }} खुद को संगीत अन्वीक्षण और अनुसंधान को समर्पित किए दर्नाल ने परंपरागत वाद्य-यंत्र और लोक संगीत की खोज में [[सुदूरपश्चिम प्रदेश]] के दुर्गम गाँवों समेत संपूर्ण नेपाल की यात्रा की। माना जाता है की उन्होंने अपने सफ़र में हुड़का सहित कुल 365 क़िस्म के बाजाएँ इकट्ठे किए। <ref name="Nayapatrika">{{citation|title=बाजा-संवाद : रामशरण दर्नालसँग|trans-title= बाजा संवाद: रामशरण दर्नाल के साथ |first= दीपक |last= सापकोटा |date=30 अक्टूबर 2009|publisher=गोरखापत्र}}</ref> उन्हें आधिकारिक अभिलेखों में वाद्य-यंत्रों के पंजीकरण की शुरुआत करनेवाले पहले शख़्स के रूप से जाना जाता है। 1968 में भारी मानसून बरसात की वजह से दर्नाल का घर ढह गया, जिसके नीचे उनकी माँ और अन्य 15 क़िस्म के बाजाएँ दब गए। इस घटना को वे अपने जीवन के न्यूनतम बिंदु मानते थे। बाद में संगीत से मुड़कर साहित्य की तरफ़ ज़्यादा सक्रिय होने पर उनकी ज़िंदगी ने एक नया मोड़ ले लिया। 1967 के आसपास उन्होंने [[वाराणसी]] में स्थित ''सँगालो'' नामक अख़बार में अपना पहला लेख, "नेपाली संस्कृति में वाद्यवादन का स्थान" प्रकाशित किया। एक साल बाद सो लेख को संशोधित करके ''[[गोरखापत्र]]'' में प्रकाशित किया गया। उन्होंने कुल मिलाकर नेपाली संगीत और 375 विलुप्तप्राय परंपरागत बाजाओं पर आधारित 11 किताबें लिखे, जो 1960 के दशक में नेपाल में दुर्लभ थीं। <ref name="yalambartimes"/><ref name="Gorkhapatra ">{{citation|title= बाजाबारे सोधखोज नहुँदा|trans-title= बाजाओं के बारे में सवाल न उठने पर |first= नरेश |last= खपांगी मगर|date=24 अगस्त 2003|publisher= गोरखापत्र }}</ref><ref name="Gorkhapatra3 ">{{citation|title=छाप्रोमै बसेर लेखेँ|trans-title= झोपड़ी में बैठकर लिखा |first= जयदेव |last= भट्टराई |date=19 सितंबर 2009|publisher= गोरखापत्र }}</ref> [[बिसे नगर्ची]] की जीवनी के अध्ययन शुरू करनेवाले दर्नाल को मेहनत और दृढ़ता का प्रतीक माना जाता है। <ref name="Annapurna1 ">{{citation|title=आ-आफ्नै पङ्ख उचाली|trans-title= खुद के पर उठाकर |first= गोपीकृष्ण|last= ढुंगाना |date=21 जनवरी 2009|publisher= अन्नपूर्ण पोस्ट}}</ref>
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