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== मैनपुरी षड्यन्त्र == सन १९१५ में [[भाई परमानन्द]] की फाँसी का समाचार सुनकर रामप्रसाद [[ब्रिटिश साम्राज्य]] को समूल नष्ट करने की प्रतिज्ञा कर चुके थे, १९१६ में एक [[पुस्तक]] छपकर आ चुकी थी, कुछ नवयुवक उनसे जुड़ चुके थे, स्वामी सोमदेव का आशीर्वाद भी उन्हें प्राप्त हो चुका था। एक संगठन उन्होंने [[पं॰ गेंदालाल दीक्षित]] के मार्गदर्शन में ''मातृवेदी'' के नाम से खुद खड़ा कर लिया था। इस संगठन की ओर से एक इश्तिहार और एक प्रतिज्ञा भी प्रकाशित की गयी। दल के लिये धन एकत्र करने के उद्देश्य से रामप्रसाद ने, जो अब तक 'बिस्मिल' के नाम से प्रसिद्ध हो चुके थे, जून १९१८ में दो तथा सितम्बर १९१८ में एक - कुल मिलाकर तीन डकैती भी डालीं, जिससे पुलिस सतर्क होकर इन युवकों की खोज में जगह-जगह छापे डाल रही थी। २६ से ३१ दिसम्बर १९१८ तक [[दिल्ली]] में लाल किले के सामने हुए [[कांग्रेस]] अधिवेशन में इस संगठन के नवयुवकों ने चिल्ला-चिल्ला कर जैसे ही पुस्तकें बेचना शुरू किया कि [[पुलिस]] ने छापा डाला किन्तु बिस्मिल की सूझ बूझ से सभी पुस्तकें बच गयीं। पण्डित गेंदालाल दीक्षित का जन्म [[यमुना]] किनारे स्थित मई गाँव में हुआ था। [[इटावा]] जिले के एक प्रसिद्ध कस्बे [[औरैया]] के [[डीएवी]] [[स्कूल]] में अध्यापक थे। देशभक्ति का जुनून सवार हुआ तो ''शिवाजी समिति'' के नाम से एक संस्था बना ली और हथियार एकत्र करने शुरू कर दिये। [[आगरा]] में हथियार लाते हुए पकड़े गये थे। किले में कैद थे वहाँ से पुलिस को चकमा देकर रफूचक्कर हो गये। बिस्मिल की ''मातृवेदी'' संस्था का विलय शिवाजी समिति में करने के बाद दोनों ने मिलकर कई काम किये। एक बार पुन: पकड़े गये, पुलिस पीछे पड़ी थी, भाग कर दिल्ली चले गये जहां उनका प्राणान्त हुआ। बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा में पण्डित गेन्दालाल जी का बड़ा मार्मिक वर्णन किया है। [[मैनपुरी षडयंत्र]] में शाहजहाँपुर से ६ युवक शामिल हुए थे जिनके लीडर रामप्रसाद बिस्मिल थे किन्तु वे पुलिस के हाथ नहीं आये, तत्काल फरार हो गये। १ नबम्बर १९१९ को मजिस्ट्रेट बी॰ एस॰ क्रिस ने मैनपुरी षडयन्त्र का फैसला सुना दिया। जिन-जिन को सजायें हुईं उनमें मुकुन्दीलाल के अलावा सभी को फरवरी १९२० में आम माफी के ऐलान में छोड़ दिया गया। बिस्मिल पूरे २ वर्ष भूमिगत रहे। उनके दल के ही कुछ साथियों ने शाहजहाँपुर में जाकर यह अफवाह फैला दी कि भाई रामप्रसाद तो पुलिस की गोली से मारे गये जबकि सच्चाई यह थी कि वे पुलिस मुठभेड़ के दौरान यमुना में छलाँग लगाकर पानी के अन्दर ही अन्दर योगाभ्यास की शक्ति से तैरते हुए मीलों दूर आगे जाकर नदी से बाहर निकले और जहाँ आजकल [[ग्रेटर नोएडा]] आबाद हो चुका है वहाँ के निर्जन बीहड़ों में चले गये। वहाँ उन दिनों केवल [[बबूल]] के ही वृक्ष हुआ करते थे; और ऊसर जमीन में आदमी तो कहीं दूर-दूर तक दिखता ही नहीं था।
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