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== माधुर्य भक्ति का वर्णन== उक्त तीनों ग्रंथों में [[राधा]]-[[कृष्ण]] की प्रेम -लीलाओं का वर्णन करते समय रूपरसिक जी ने अपने उपास्य ,उपासना तथा उपासक भाव के प्रति जो विचार प्रकट किये हैं उनका सारांश इस प्रकार है : *रूपरसिक के उपास्य राधा-माधव सर्व समर्थ हैं। *राधा-माधव की राजधानी वृन्दावन है जहां ये भक्तों को अपनी वभिन्न लीलाओं से सुख प्रदान करते हुए सदा निवास करते हैं। *राधा-माधव की सेवा भक्त को अनायास ही आनन्द की प्राप्त हो जाती है। ;हमारे राधा माधो धेय। ;कहु बात की कमी न राखें जो चाहें सो देय।। ;रजधानी वृन्दावन जैसी निगमागम की ज्ञेय। ;अनायास ही रूपरसिक जन पावत सब सुख सेय।। राधा-कृष्ण के विहार का दर्शन कर उसी के ध्यान में सदा लीन रहना ही इनकी उपासना एवं भजन-रीति है। इसी से सहज-प्रेम की प्राप्ति सम्भव है: ;पिय लिय लगाय हिय सों प्रवीनि। ;मन भायो सुख ले छाँड़ि दीनि।। ;यह दम्पती को मधुरितु विलास। ;गावै जो पावै प्रेमरास।। ;महा मधुर मधुर ते अति अनूप। ;रसपान करे होय रसिक रूप।।
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