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== राजनीतिक जीवन == [[चित्र:L.B.Shastri1286.gif|thumb|right|200px|'''"मरो नहीं, मारो!"''' का नारा लालबहादुर शास्त्री ने दिया जिसने क्रान्ति को पूरे देश में प्रचण्ड किया।]] संस्कृत भाषा में [[स्नातक]] स्तर तक की [[शिक्षा]] समाप्त करने के पश्चात् वे [[भारत सेवक समाज|भारत सेवक संघ]] से जुड़ गये और देशसेवा का व्रत लेते हुए यहीं से अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत की। शास्त्रीजी सच्चे [[गांधीवाद|गान्धीवादी]] थे जिन्होंने अपना सारा जीवन सादगी से बिताया और उसे गरीबों की सेवा में लगाया। [[भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन|भारतीय स्वाधीनता संग्राम]] के सभी महत्वपूर्ण कार्यक्रमों व आन्दोलनों में उनकी सक्रिय भागीदारी रही और उसके परिणामस्वरूप उन्हें कई बार जेलों में भी रहना पड़ा। स्वाधीनता संग्राम के जिन आन्दोलनों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही उनमें [[१९२१|1921]] का [[असहयोग आन्दोलन|असहयोग आंदोलन]], [[१९३०|1930]] का [[दांडी मार्च]] तथा [[१९४२|1942]] का [[भारत छोड़ो आन्दोलन]] उल्लेखनीय हैं। दूसरे विश्व युद्ध में [[इंग्लैण्ड]] को बुरी तरह उलझता देख जैसे ही नेताजी ने [[आज़ाद हिन्द फ़ौज|आजाद हिन्द फौज]] को "दिल्ली चलो" का नारा दिया, [[महात्मा गांधी|गान्धी]] जी ने मौके की नजाकत को भाँपते हुए 8 अगस्त 1942 की रात में ही [[मुम्बई|बम्बई]] से अँग्रेजों को "भारत छोड़ो" व भारतीयों को "करो या मरो" का आदेश जारी किया और सरकारी सुरक्षा में यरवदा [[पुणे]] स्थित [[आगा खान पैलेस]] में चले गये। 9 अगस्त 1942 के दिन शास्त्रीजी ने [[इलाहाबाद]] पहुँचकर इस आन्दोलन के गान्धीवादी नारे को चतुराई पूर्वक '''"मरो नहीं, मारो!"''' में बदल दिया और अप्रत्याशित रूप से क्रान्ति की [[दावानल]] को पूरे देश में प्रचण्ड रूप दे दिया। पूरे ग्यारह दिन तक भूमिगत रहते हुए यह आन्दोलन चलाने के बाद 19 अगस्त 1942 को शास्त्रीजी गिरफ्तार हो गये। शास्त्रीजी के राजनीतिक दिग्दर्शकों में [[पुरुषोत्तम दास टंडन|पुरुषोत्तमदास टंडन]] और पण्डित [[गोविन्द बल्लभ पन्त|गोविंद बल्लभ पंत]] के अतिरिक्त [[जवाहरलाल नेहरू]] भी शामिल थे। सबसे पहले [[१९२९|1929]] में [[इलाहाबाद]] आने के बाद उन्होंने टण्डनजी के साथ भारत सेवक संघ की [[इलाहाबाद]] इकाई के सचिव के रूप में काम करना शुरू किया। इलाहाबाद में रहते हुए ही नेहरूजी के साथ उनकी निकटता बढ़ी। इसके बाद तो शास्त्रीजी का कद निरन्तर बढ़ता ही चला गया और एक के बाद एक सफलता की सीढियाँ चढ़ते हुए वे नेहरूजी के मंत्रिमण्डल में गृहमन्त्री के प्रमुख पद तक जा पहुँचे। और इतना ही नहीं, नेहरू के निधन के पश्चात [[भारत]]वर्ष के प्रधान मन्त्री भी बने।
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