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==माधुर्य भक्ति का वर्णन == विट्ठलविपुल देव के उपास्य श्यामा-श्याम परम रसिक हैं। ये नित्य -किशोर सदा विहार में लीन रहते हैं। इनकी वह निकुंज-क्रीड़ा केलि रस-पागी होने पर प्रेम-परक होने के कारण सदा भक्तों का मंगल विधान करती है। विट्ठलविहारी देव ने नित्य विहारी को ही उपास्य स्वीकार किया है ,कुछ लीला परक पदों में उनका नित्य-नव सम्बन्ध सूचित होता है : ;मिलि खेलि मोहन सो करि मनभायो। ;कुंज बिहारीलाल रसबस बिलसत मेरे तन मन फूलि अपनो कर पायो।। ;तुम बिन दुलहिन ए दिन दूलह सघन लता गृह मंडप छायो। ;कोकिल मधुपगन परेगी भाँवरी तहाँ श्री विट्ठलविपुल मृदंग बजायो।। उपास्य -युगल की लीलाओं का गान एवं ध्यान ही इनकी उपासना है। अतः इन्होंने युगल की प्रातःकाल से निशा-पर्यन्त होने वाली सभी लीलाओं का गान अपनी वाणी में किया है। इनमें से वन-विहार ,झूलन, वीणा -वादन-शिक्षा आदि लीलाएं उल्लेखनीय हैं। जिनकी बाँसुरी की तान सुनकर चार,अचर सभी मोहित हो जाते हैं। उन्हीँ विहारीजू को वीणा सिखाती हुई श्यामाजू का यह वर्णन भाव और भाषा दोनों दृष्टियों से सुन्दर है : ;प्यारी पियहि सिखावति बीना। ;ताल बंध्यान कल्यान मनोहर इत मन देह प्रवीना।। ;लेति सम्हारि- सम्हारि सुघरवर नागरि कहति फबीना। ;श्री विट्ठलविपुल विनोद बिहारी कौ जानत भेद कवीना।।
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