सामग्री पर जाएँ
मुख्य मेन्यू
मुख्य मेन्यू
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
मार्गदर्शन
मुखपृष्ठ
हाल में हुए बदलाव
बेतरतीब पृष्ठ
मीडियाविकि के बारे में सहायता
भारतपीडिया
खोजें
खोजें
दिखावट
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
व्यक्तिगत उपकरण
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
लॉग-आउट किए गए संपादकों के लिए पृष्ठ
अधिक जानें
योगदान
वार्ता
"
वेद
" (अनुभाग) सम्पादित करें
पृष्ठ
चर्चा
हिन्दी
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
उपकरण
उपकरण
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
क्रियाएँ
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
सामान्य
कड़ियाँ
पृष्ठ से जुड़े बदलाव
विशेष पृष्ठ
पृष्ठ की जानकारी
दिखावट
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
चेतावनी:
आपने लॉग-इन नहीं किया हुआ है। अगर आप सम्पादन करते हैं तो इस पृष्ठ के सम्पादन इतिहास में आपका IP पता दृश्य होगा। अगर आप
लॉग-इन
करते हैं या
खाता बनाते हैं
तो दूसरी सुविधाओं के साथ-साथ आपके सम्पादनों का श्रेय आपके सदस्यनाम पर दिया जाएगा।
ऐन्टी-स्पैम जाँच। इसे
नहीं
भरें!
== वेद-भाष्यकार == प्राचीन काल में माना जाता है कि अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा ऋषियों को वेदों का ज्ञान मिला उसके बाद ब्रह्मा को और उसके बाद सात ऋषियों ([[सप्तर्षि]]) को यह ज्ञान मिला - इसका उल्लेख गीता में हुआ है। ऐतिहासिक रूप से ब्रह्मा, उनके मरीचि, अत्रि आदि सात और पौत्र [[कश्यप]] और अन्य यथा [[जैमिनि|जैमिनी]], [[पतञ्जलि|पतंजलि]], [[मनु]], [[वात्स्यायन]], [[कपिल]], [[कणाद]] आदि मुनियों को वेदों का अच्छा ज्ञान था। व्यास ऋषि ने [[श्रीमद्भगवद्गीता|गीता]] में कई बार वेदों (श्रुति ग्रंथों) का ज़िक्र किया है। अध्याय 2 में कृष्ण, अर्जुन से ये कहते हैं कि वेदों की अलंकारमयी भाषा के बदले उनके वचन आसान लगेंगे।<ref> गीता २.५३ - ''श्रुति विप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला। समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्यसि॥'' - यानि (हे अर्जुन) यदि तुम्हारा मन श्रुति में घुसकर भी शांत रहे, समाधि में बुद्धि अविचल रहे तभी तुम्हें सच्चा दिव्य योग मिला है। </ref> मध्यकाल में [[सायण]]ाचार्य को वेदों का प्रसिद्ध [[भाष्यकार]] मानते हैं - लेकिन साथ ही यह भी मानते हैं कि उन्होंने ही प्रथम बार वेदों के भाष्य या अनुवाद में देवी-देवता, इतिहास और कथाओं का उल्लेख किया जिसको आधार मानकार [[महीधर]] और अन्य भाष्यकारों ने ऐसी व्याख्या की। [[महीधर]] और [[उवट|उव्वट]] इसी श्रेणी के भाष्यकार थे। आधुनिक काल में [[राजा राममोहन राय]] का [[ब्रह्म समाज]] और [[दयानन्द सरस्वती]] का [[आर्य समाज]] लगभग एक ही समय (1800-1900 ईसवी) में वेदों के सबसे बड़े प्रचारक बने। [[दयानन्द सरस्वती]] ने यजुर्वेद और ऋग्वेद का लगभग सातवें मंडल के कुछ भाग तक भाष्य किया। सामवेद और अथर्ववेद का भाष्य पं० हरिशरण सिद्धान्तलंकार ने किया है। वैदिक संहिताओं के अनुवाद में [[रमेशचन्द्र दत्त|रमेशचंद्र दत्त]] बंगाल से, [[रामगोविन्द त्रिवेदी]] एवं [[जयदेव वेदालंकार]] के हिन्दी में एवं [[श्रीधर पाठक]] का मराठी में कार्य भी लोगों को वेदों के बारे में जानकारी प्रदान करता रहा है। इसके बाद गायत्री तपोभूमि के [[राम शर्मा|श्रीराम शर्मा आचार्य]] ने भी वेदों के भाष्य प्रकाशित किये हैं - इनके भाष्य सायणाधारित हैं। अन्य भी वेदों के अनेक भाष्यकार हैं। === वेदों का प्रकाशन === वेदों का प्रकाशन [[शंकर पाण्डुरंग]] ने सायण भाष्य के अलावा अथर्ववेद का चार जिल्दों में प्रकाशन किया। [[बाल गंगाधर तिलक|लोकमान्य तिलक]] ने ''ओरायन'' और ''द आर्कटिक होम इन वेदाज़'' नामक दो ग्रंथ वैदिक साहित्य की समीक्षा के रूप में लिखे। [[बालकृष्ण दीक्षित]] ने सन् 1877 ई० में कोलकाता से सामवेद पर अपने ज्ञान का प्रकाशन कराया। [[श्रीपाद दामोदर सातवलेकर]] ने [[सातारा]] में चारों वेदों की संहिता का श्रमपूर्वक प्रकाशन कराया। [[तिलक विद्यापीठ]], [[पुणे]] से पाँच जिल्दों में प्रकाशित ऋग्वेद के [[सायण भाष्य]] के प्रकाशन को भी प्रामाणिक माना जाता है। === विदेशी प्रयास === सत्रहवीं सदी में मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब के भाई [[दारा शिकोह|दारा शूकोह]] ने कुछ उपनिषदों का [[फ़ारसी भाषा|फ़ारसी]] में अनुवाद किया (''सिर्र ए अकबर'',سرّ اکبر महान रहस्य) जो पहले फ्रांसिसी और बाद में अन्य भाषाओं में अनूदित हुईं। यूरोप में इसके बाद वैदिक और संस्कृत साहित्य की ओर ध्यान गया। [[मैक्स मूलर]] जैसे यूरोपीय विद्वान ने भी संस्कृत और वैदिक साहित्य पर बहुत अध्ययन किया है। लेकिन यूरोप के विद्वानों का ध्यान हिन्द आर्य भाषा परिवार के सिद्धांत को बनाने और उसको सिद्ध करने में ही लगा हुआ है। शब्दों की समानता को लेकर बने इस सिद्धांत में ऐतिहासिक तथ्यों और काल निर्धारण को तोड़-मरोड़ करना ही पड़ता है। इस कारण से वेदों की रचना का समय १८००-१००० ईसा पूर्व माना जाता है जो संस्कृत साहित्य और हिन्दू सिद्धांतों पर खरा नहीं उतरता। लेकिन आर्य जातियों के प्रयाण के सिद्धांत के तहत और भाषागत दृष्टि से यही काल इन ग्रंथों की रचना का मान लिया जाता है। === वेदों का काल === वेदों का अवतरण काल वर्तमान सृष्टि के आरंभ के समय का माना जाता है। इसके हिसाब से वेद को अवतरित हुए 2017 (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा [[विक्रम संवत|विक्रमी संवत]] 2074) को 1,96,08,53,117 वर्ष होंगे। वेद अवतरण के पश्चात् [[श्रुति]] के रूप में रहे और काफी बाद में वेदों को लिपिबद्ध किया गया और वेदों को संरक्षित करने अथवा अच्छी तरह से समझने के लिये वेदों से ही वेदांगों का आविष्कार किया गया। इसमें उपस्थित खगोलीय विवरणानुसार कई इतिहासकार इसे ५००० से ७००० साल पुराना मानते हैं परंतु आत्मचिंतन से ज्ञात होता है कि जैसे सात दिन बीत जाने पर पुनः रविवार आता है वैसे ही ये खगोलीय घटनाएं बार बार होतीं हैं अतः इनके आधार पर गणना श्रेयसकर नहीं।<ref>आर्यों का आदिदेश</ref> वेद हमें ब्रह्मांड के अनोखे, अलौकिक व ब्रह्मांड के अनंत राज बताते हैं जो साधारण समझ से परे हैं। वेद की पुरातन नीतियां व ज्ञान इस दुनिया को न केवल समझाते हैं अपितु इसके अलावा वे इस दुनियां को पुनः सुचारू तरीके से चलाने में मददगार साबित हो सकते हैं।
सारांश:
भारतपीडिया पर किया कोई भी योगदान अन्य सदस्यों द्वारा बदला जा सकता है और हटाया भी जा सकता है। अगर आपको अपने लिखे हुए पाठ में संपादन होना नामंजूर है तो यहाँ पर न लिखें।
आप हमें यह भी वचन देतें हैं कि यह आपने स्वयं लिखा है अथवा सार्वजनिक क्षेत्र या किसी समान मुक्त स्रोत से प्रतिलिपित किया है (अधिक जानकारी के लिये
भारतपीडिया:कॉपीराइट
देखें)।
कॉपीराइट सुरक्षित कार्यों को बिना अनुमति के यहाँ न डालें!
रद्द करें
सम्पादन सहायता
(नए विंडो में खुलता है)