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==प्रयोजनवाद के सिद्धान्त== एक मानवतावादी दर्शन होने के कारण प्रयोजनवाद संसार एवं उसकी वस्तुओं तथा क्रियाओं के कारणों पर उस गंभीरता से विचार नहीं करता जितना मानव जीवन में उसकी उपयोगिता पर विचार करता है। एक स्वतंत्र दर्शन के रूप में अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए प्रयोजनवाद ने मानव को आधार बनाते हुए संसार एवं उसकी क्रियाओं के कारणों पर विचार करते हुए निम्नलिखित मूल सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है- *(१) प्रयोजनवाद किसी भी शाश्वत ‘मूल्य’ तथा शाश्वत ‘सत्य’ में विश्वास नहीं करता है। इसकी धारणा है कि मूल्य एवं सत्य देश, काल एवं परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहते हैं। प्रयोजनवाद यदि किसी शाश्वत मूल्य में विश्वास करता है तो वह ‘शिव’ (उपयोगिता) है। इसलिए जीवन के स्थायी एवं निश्चित आदर्श की सत्ता को स्वीकार नहीं करता। *(२) प्रयोजनवादी व्यावहारिक जीवन मात्र से सम्बन्ध रखना उचित समझते हैं। ईश्वर, आत्मा, धर्म, इत्यादि का व्यावहारिक जीवन से सम्बन्ध न होने के कारण इनका कोई महत्व नहीं है। *(३) प्रयोजनवाद यह मानता है कि इस संसार में यथार्थ (reality) का ज्ञान संभव नहीं है। *(४) प्रयोजनवाद की यह धारणा है कि मनुष्य ‘परिकल्पना’ का प्रयोग करके ज्ञान के समीप पहुंँच सकता है। *(५) प्रयोजनवादी अंधविश्वास का विरोध करते हैं। वे [[विज्ञान]] में तो विश्वास करते हैं किन्तु यन्त्रवादी नहीं होते। वे विकास का समर्थन करते हैं। प्रयोजनवाद शाश्वत वास्तविकता में विश्वास नहीं करता है क्योंकि उसके अनुसार वास्तविकता का निर्माण होता रहता है। *(६) प्रयोजनवादियों के अनुसार सत्य कोई ऐसी वस्तु नहीं है जो पहले से विद्यमान हो। परिस्थितियों के परिवर्तन के फलस्वरूप मनुष्य के समक्ष अनेक समस्यायें उत्पन्न होती है जिनकी पूर्ति के लिए मनुष्य चिन्तन करता है। चिन्तन में आये सभी विचार सत्य नहीं होते, सत्य केवल वे ही विचार होते हैं जिनके प्रयोग से सन्तोषजनक फल की प्राप्ति होती है। *(७) प्रयोजनवाद समाज में व्याप्त रूढ़ियों, मान्यताओं, परम्पराओं, बन्धनों, अंधविश्वासों आदि में कोई आस्था नहीं रखता। यह जीवन की वास्तविक परिस्थितियों में, जीवन की अनेक प्रकार की क्रियाओं में ज्यादा विश्वास करता है। प्रयोजनवाद के अनुसार विचारों की उत्पत्ति क्रिया के बाद होती है, इसलिए विचारों की अपेक्षा क्रिया को अधिक महत्व प्रदान किया जाता है। *(८) मनुष्य रचनात्मक कार्य करता है, यथार्थ की रचना में भी उसका योगदान है तथा मूल्य भी मानव द्वारा ही निर्मित होते हैं। *(९) प्रज्ञा व्यक्ति को वातावरण के अनुकूल बनाने की शक्ति देती है। *(१०) आदर्शवादी विचारकों के समान प्रयोजनवादी विचारक भी मनुष्य को विश्व का सर्वोच्च प्राणी मानते हैं। प्रयोजनवादियों के अनुसार मनुष्य ही एक ऐसा मनःशारीरिक प्राणी है जो अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए अनेक प्रकार की उच्चतम क्रियायें करता है। वह क्रियाओं की उपयोगिता एवं अनुपयोगिता को देखकर अनुभवों का संचय करता है तथा मानव-सभ्यता का सृजन एवं संवर्द्धन करता है।
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