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== सम्मान और पदवी == देवर्षि श्रीकृष्ण भट्ट जी को '''‘कविकलानिधि’''' तथा '''‘रामरासाचार्य’''' की उपाधि प्रदान करके सम्मानित किया गया था। महाराजा जयसिंह ने वेद-शास्त्रों पर उनके अद्भुत वैदुष्य तथा संस्कृत, प्राकृत तथा ब्रजभाषा में रसात्मक कविता करने की अनुपम क्षमता से प्रभावित होकर उन्हें ‘कविकलानिधि’ के अलंकरण से सम्मानित किया था। स्वयं [[जय सिंह द्वितीय|सवाई जयसिंह]] ने ही उन्हें ‘रामरासाचार्य’ की पदवी से भी सम्मानित किया था, जिसके सन्दर्भ में एक रोचक प्रसंग का विवरण मिलता है। एक दरबार के दौरान महाराजा जयसिंह ने सभासदों से पूछा कि जिस तरह श्रीकृष्ण की रासलीला का वर्णन मिलता है, क्या उस तरह श्रीराम की रासलीला के प्रसंग का भी कहीं कोई उल्लेख है? पूरे दरबार में चुप्पी छा गई। तभी श्रीकृष्ण भट्ट जी खड़े हुए और उन्होंने कहा कि ऐसी एक पुस्तक काशी में उपलब्ध है। राजा ने उन्हें इस पुस्तक को दो महीनों के भीतर ले आने के लिए कहा। श्रीकृष्ण भट्ट जी यह जानते थे कि वास्तव में ऐसी कोई पुस्तक कहीं थी ही नहीं, जब कि उन्होंने ऐसी पुस्तक के काशी में होने की बात कह दी थी। उन्होंने तब स्वयं राम-रास पर काव्य लिखना प्रारम्भ किया और दो महीने के भीतर ही [[बृज भाषा|ब्रजभाषा]] में “रामरासा” नामक पुस्तक तैयार कर दी जो [[रामायण]] के ही समकक्ष थी। समय सीमा के अंदर पुस्तक पाकर और यह जान कर कि यह काव्य स्वयं कविकलानिधि श्रीकृष्ण भट्ट ने ही लिखा है, कविता-कला-मर्मज्ञ महाराजा अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने भट्टजी को “रामरासाचार्य” की पदवी और विपुल धनराशि देकर सम्मानित किया।<ref>“साहित्य वैभवम्”, मंजुनाथ ग्रंथावलिः, सं. प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी, [[राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली]], 2010, ISBN 978-81-86111-33-8</ref>
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