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== सन्यास == [[चित्र:Swami Ramtirth2715.jpg|thumb|left|150px|स्वामी रामतीर्थ का एक दुर्लभ चित्र]] वर्ष १९०१ में प्रो॰ तीर्थराम ने [[लाहौर]] से अन्तिम विदा लेकर परिजनों सहित [[हिमालय]] की ओर प्रस्थान किया। अलकनन्दा व भागीरथी के पवित्र संगम पर पहूँचकर उन्होंने पैदल मार्ग से गंगोत्री जाने का मन बनाया। [[नई टिहरी|टिहरी]] के समीप पहुँचकर नगर में प्रवेश करने की बजाय वे कोटी ग्राम में शाल्माली वृक्ष के नीचे ठहर गये। ग्रीष्मकाल होने के कारण उन्हें यह स्थान सुविधाजनक लगा। मध्यरात्रि में प्रो॰ तीर्थराम को आत्म-साक्षात्कार हुआ। उनके मन के सभी भ्रम और संशय मिट गये। उन्होंने स्वयं को ईश्वरीय कार्य के लिए समर्पित कर दिया और वह प्रो॰ तीर्थराम से रामतीर्थ हो गये। उन्होंने द्वारिका पीठ के शंकराचार्य के निर्देशानुसार केश व मूँछ आदि का त्यागकर सन्यास ले लिया तथा अपनी पत्नी व साथियों को वहाँ से वापस लौटा दिया। [[राम प्रसाद 'बिस्मिल']] ने अपनी पुस्तक '''मन की लहर''' में ''युवा सन्यासी''<ref>''मन की लहर'' पृष्ठ २०</ref> शीर्षक से एक बड़ी ही मार्मिक कविता लिखी थी जिसके कुछ अंश इस प्रकार हैं: {{Quotation|"वृद्ध पिता-माता की ममता, बिन ब्याही कन्या का भार;शिक्षाहीन सुतोंकी ममता, पतिव्रता पत्नी का प्यार.<br />सन्मित्रों की प्रीति और, कालेज वालों का निर्मल प्रेम;त्याग सभी अनुराग किया, उसने विराग में योगक्षेम.<br />प्राणनाथ बालक-सुत-दुहिता, यूँ कहती प्यारी छोड़ी;हाय! वत्स वृद्धा के धन, यूँ रोती महतारी छोड़ी.<br />चिर-सहचरी रियाजी छोड़ी, रम्यतटी रावी छोड़ी.शिखा-सूत्र के साथ हाय!उन बोली पंजाबी छोड़ी."<br />*'''युवा-सन्यासी''' (स्वामी रामतीर्थ के सन्यासोपलक्ष्य में रचित)}}
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