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== बाल प्रबोधन == === शिक्षण और प्रेरणा === शिशु के विकास के लिए जितना आवश्यक स्नेह-दुलार है, उतना ही आवश्यक है, उसे समयानुकूल उद्बोधन देना। यह नहीं सोचना चाहिए कि बालक क्या समझता है? यह बड़ी भ्रान्ति है। समझने-समझाने के लिए भाषा भी एक माध्यम है; पर वही सब कुछ नहीं, स्नेह-स्पन्दनों और विचार-तरंगों के सहारे मनुष्य अधिक गहराई से समझता है। भाषा भी उसी को स्पष्ट करती है। बालक भाषा न भी समझे, तो भी मूल स्पन्दनों के प्रति बहुत संवेदनशील होता है। अपने मनोरंजन या खीझ की प्रतिक्रिया स्वरूप उसके साथ फूहड़ वार्तालाप नहीं करना चाहिए, उसे सम्बोधन करके प्रबोधन देने का शुभारम्भ इस संस्कार के समय किया जाता हैं, जिसे विचारशीलों, हितैषियों द्वारा आगे भी चलाते रहना चाहिए। क्रिया और भावना आचार्य बालक को गोद में लें। उसके कान के पास नीचे वाला मन्त्र बोलें। सभी लोग भावना करें कि भाव-भाषा को शिशु हृदयंगम कर रहा है और श्रेष्ठ सार्थक जीवन की दृष्टि प्राप्त कर रहा है। <blockquote> '''ॐ शुद्धोऽसि बुद्धोऽसि निरंजनोऽसि, संसारमाया परिवर्जितोऽसि। संसारमायां त्यज मोहनिद्रां, त्वां सद्गुरुः शिक्षयतीति सूत्रम्॥''' </blockquote> प्रबोधन के बाद पूर्णाहुति आदि शेष कृत्य पूरे किये जाएँ। विसर्जन के पूर्व आचार्य, शिशु एवं अभिभावकों को पुष्प, अक्षत, तिलक सहित आशीर्वाद दें, फिर सभी मंगल मन्त्रों के साथ अक्षत, पुष्प वृष्टि करके आशीर्वाद दें।
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