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=== शिक्षण-स्थानान्तरण के सिद्धान्त === शिक्षण-स्थानान्तण के अधोलिखित सिद्धान्त प्रचलित हैं- ( 1 ) समान अंशों का सिद्धान्त ( थ्यौरी ऑफ आइडेन्टिकल एलिमेन्ट्स )। ( 2 ) असामान्य तथा विशिष्ट अंश का सिद्धान्त ( थ्यौरी ऑफ ' जी ' एण्ड ' एस ' फैक्टर )। ( 3 ) औपचारिक अनुशासन का सिद्धान्त ( थ्यौरी ऑफ कार्नल डिसिप्लिन )। ( 4 ) सामान्यीकरण का सिद्धान्त ( थ्यौरी ऑफ जेनरलाइजेशन )। '''( 1 ) समान अंशों का सिद्धान्त -'''इस सिद्धान्त का प्रतिपादन '''थार्नडाइक''' महोदय ने किया था। उनका मानना था कि एक विषय का अध्ययन दूसरे विषय के अध्ययन में तभी सहायक प्रमाणित हो सकता है जब कुछ मात्रा में इन दोनों में पारस्परिक समानता हो। इसके विपरीत यदि विषयों या परिस्थितियों में कुछ समान अंश नहीं है तो एक विषय का अध्ययन दूसरे विषय के अध्ययन में कोई सहायता नहीं पहुंचा सकता। उदाहरणार्थ जिस व्यक्ति ने मनोविज्ञान का अध्ययन किया है, वह यदि सैन्य मनोविज्ञान का अध्ययन करता है तो उसे सरलता होगी। इसी प्रकार यदि एक व्यक्ति कार चला लेता है तो उसे स्कूटर चलाने में सरलता होगी। क्योंकि इन कार्यों में कुछ अंशों में समानता है। '''( 2 ) सामान्य तथा विशिष्ट अंश का सिद्धान्त -''' सामान्य तथा विशिष्ट अंश का सिद्धान्त, जिसे द्वितालिक सिद्धान्त के रूप में भी जाना जाता है, का प्रतिपादन स्पीयर मैन महोदय ने किया है। उनके अनुसार प्रत्येक विषय का अधिगम करने के लिये व्यक्ति को सामान्य योग्यता तथा विशेष योग्यता की आवश्यकता पड़ती है। विषय के अध्ययन के साथ-साथ व्यक्ति की सामान्य योग्यता एवं विशिष्ट योग्यता भी बढ़ती है। लेकिन स्पीयर मैन का मानना है कि स्थानान्तरण विशिष्ट योग्यता में नहीं होता वरन् सामान्य योग्यता में होता है। इस सिद्धान्त के अनुसार गणित, इतिहास, विज्ञान इत्यादि विषयों में विशेष अंश की अपेक्षा सामान्य अंश की अधिक आवश्यकता पड़ती है, फलस्वरूप इन विषयों में स्थानान्तरण का अधिक महत्व है। '''( 3 ) औपचारिक अनुशासन का सिद्धान्त -''' अभ्यास द्वारा मस्तिष्क की शक्तियों को घनिष्ठ बनाकर उन्हें किसी भी परिस्थिति में प्रयुक्त करना शक्ति मनोविज्ञान ( फैकल्टी सायकोलाजी ) का विषय क्षेत्र है तथा औपचारिक अनुशासन का सिद्धान्त शक्ति मनोविज्ञान पर ही आधारित है। शक्ति मनोविज्ञान के समर्थकों का मानना है कि व्यक्ति का मस्तिष्क अनेक शक्तियों यथा स्मृति, कल्पना, निरीक्षण, व तर्क आदि का योग मात्र है। औपचारिक अनुशासन के सिद्धान्त के अनुसार कोई भी व्यक्ति अभ्यास के द्वारा इन शक्तियों को इतना दृढ बना सकता है कि वह इनका किसी भी परिस्थिति में निपुणतापूर्वक प्रयोग कर सके। उदाहरणार्थ, यदि किसी व्यक्ति को अपनी शक्ति की वृद्धि करनी है तो उसे स्मृति के स्वरूपों का अध्ययन करना चाहिये। यह सिद्धान्त स्वरूप पर अधिक बल देता है, विषय से सम्बन्धित सामग्री पर नहीं। मस्तिष्क की शक्तियों यथा ' रमृति ' नीति शास्त्र तथा विशिष्ट रूप से भाषा एवं इतिहास के अध्ययन से बलवती होती है, रुचि ' साहित्य के उच्च स्तर के अध्ययन से, ' कल्पना ' काव्य के शिक्षण से तथा निरीक्षण-शक्ति ' प्रयोगशाला में विज्ञान के प्रयोग से बलिष्ठ होती है। '''सामान्यीकरण का सिद्धान्त -''' इस सिद्धान्त का प्रतिपादन '''जेड महोदय''' ने किया है। उनके अनुसार जिस सीमा तक कोई व्यक्ति अपनी अनुभूतियों के द्वारा कोई सामान्य सिद्धान्त निकाल लेता है, उसी सीमा तक शिक्षण विषय स्थानान्तरित होते हैं। सामान्यीकरण के सिद्धान्त के अनुसार कोई व्यक्ति यदि किसी परिस्थिति में अपने आराधन या अनुभूतियों के द्वारा किसी सामान्य सिद्धान्त का प्रतिपादन कर लेता है, जो किसी दूसरी परिस्थिति में उसे सहायता पहुँचा सकता है तो शिक्षण का स्थानान्तरण होता है। उदाहरणार्थ नेतृत्व की विशेषताओं से परिचित सैन्य अधिकारी अपने गुणों का प्रयोग सेना को कुशल नेतृत्व प्रदान करने में कर सकता है। शिक्षण के स्थानान्तरण का प्रयोग विशेष रूप से पाठ्यक्रम-निर्धारण में किया जाता है। अत: सैनिकों में विशिष्ट गुणों का विकास करने की दृष्टि से उनके प्रशिक्षण हेतु पाठ्यक्रम तैयार करते समय शिक्षण के स्थानान्तरण के सिद्धान्तों पर विशेष रूप से ध्यान केन्द्रित करना चाहिये। [[श्रेणी:सेना]] [[श्रेणी:शिक्षा]]
सारांश:
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