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== नीतिशास्त्र की समस्याएँ == नीतिशास्त्र की प्रमुख समस्याएं निम्नलिखित है- # परमशुभ ( summum Bonum ) या नैतिक आदर्श का स्वरूप निर्धरित करना। # यह बताना कि किस तत्व के कारण कोई कर्म उचित या अनुचित, शुभ या अशुभ है। # नैतिक निर्णयों की सूची प्रस्तुत करना। # नैतिक मापदंड (Moral standard) निर्धरित करना। # सदगुणों को स्वरूव निर्धरित करना तथा उनका वर्गीकरण करना। # कर्तव्यों एवं दायित्वों (Moral obligations) की परिभाषा एवं व्याख्या करना। # नैतिक जीवन में सुख का स्थान-निरूपण करना। # व्यक्ति और समाज के संबंधों की व्याख्या करना। # दंड के नैतिक पक्ष की सार्थकता या निरर्थकता प्रमाणिक करना। # व्यक्ति को उसके अधिकारों एवं कर्तव्यों का पाठ सिखाना। # कुछ विशेष मनोवैज्ञानिक, दार्शनिक, सामाजिक तथा राजनीतिक समस्याओं पर विचार करना। नीतिशास्त्र की समस्याओं को हम तीन वर्गों में बांट सकते हैं : * (1) 'परम श्रेय' का स्वरूप क्या है? * (2) परम श्रेय अथवा शुभ अशुभ के ज्ञान का स्रोत या साधन क्या है? * (3) नैतिक आचार की अनिवार्यता के आधार (सैंक्शंस) क्या हैं? परम श्रेय के बारे में पूर्व और पश्चिम में अनेक कल्पनाएँ की गई हैं। भारत में प्राय: सभी दर्शन यह मानते हैं कि जीवन का चरम लक्ष्य सुख है, किंतु उनमें से अधिकांश की सुख संबंधी धारणा तथाकथित [[सौख्यवाद]] (हेडॉसिनज्म) से नितांत भिन्न है। इस दूसरे या प्रचलित अर्थ में हम केवल चार्वाक दर्शन को सौख्यवादी कह सकते हैं। चार्वाक के नैतिक मंतव्यों का कोई व्यवस्थित वर्णन उपलब्ध नहीं है, किंतु यह समझा जाता है कि उसके सौख्यवाद में स्थूल ऐंद्रिय सुख को ही महत्व दिया गया है। भारत के दूसरे दर्शन जिस आत्यंतिक सुख को जीवन का लक्ष्य कहते हैं उसे अपवर्ग, मुक्ति या मोक्ष अथवा निर्वाण से समीकृत किया गया है। न्याय तथा सांख्य दर्शनों में अपवर्ग या मुक्ति की कल्पना की गई है, उसे भावात्मक सुखरूप नहीं कहा जा सकता किंतु उपनिषदों तथा वेदांत की मुक्तावस्था आनंदरूप कही जा सकती है। वेदांत की मुक्ति तथा बौद्धों का निर्वाण, दोनों ही उस स्थिति के द्योतक हैं जब व्यक्ति की आत्मा सुख दु:ख आदि द्वंद्वों से परे हो जाती है। यह स्थिति जीवनकाल में भी आ सकती है; भगवद्गीता में स्थितप्रज्ञ कहा गया है वह एक प्रकार से जीवन्मुक्त ही कहा जा सकता है। पाश्चात्य दर्शनों में परम श्रेय के संबंध में अनेक मतवाद पाए जाते हैं : * (1) सौख्यवादी सुख को जीवन का ध्एय घोषित करते हैं। सौख्यवाद के दो भेद हैं-व्यक्तिपरक सौख्यवाद तथा सार्वभौम सौख्यवाद। प्रथम के अनुसार व्यक्ति के प्रयत्नों का लक्ष्य स्वयं उसका सुख है। दूसरे के अनुसार हमें सबके सुख अथवा "अधिकांश मनुष्यों के अधिकतम सुख" को लक्ष्य मानकर चलना चाहिए। कुछ विचारकों के अनुसार सुखों में सिर्फ मात्रा का भेद होता है; दूसरों के अनुसार उनमें घटिया बढ़िया का, अर्थात् गुणात्मक अंतर भी रहता है। * (2) अन्य विचारकों के अनुसार जीवन का चरम लक्ष्य एवं परम श्रेय पूर्णत्व है, अर्थात् मनुष्य की विभिन्न क्षमताओं का पूर्ण विकास। * (3) कुछ अध्यात्मवादी अथवा प्रत्ययवादी चिंतकों ने [[आत्मलाभ]] (सेल्फरियलाइज़ेशन) को जीवन का ध्येय माना है। उनके अनुसार आत्मलाभ का अर्थ है आत्मा के बौद्धिक एवं सामाजिक अंगों का पूर्ण विकास था उपभोग। * (4) कुछ दार्शनिकों के मत में परम श्रेय कर्तव्यरूप या धर्मरूप है; नैतिक क्रिया का लक्ष्य स्वयं नैतिकता या धर्म ही है। *(5)जीवन का मार्ग सदा अपने कर्तव्यों के निर्वहन में होना चाहिए। की मेरा क्या दायित्व हे पहले अपने परिवार के प्रति फिर अपने गाव, राज्य और देश के प्रति। मानव को समाज ने नहीं बनाया बल्कि मानव ने ही समाज का निर्माण किया हे और समाज से गांव राज्य देश का निर्माण हुआ हे
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