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== शनि चालीसा <ref>{{cite web|url=https://dharmyatra.org/shani-chalisa.php|title=शनि चालीसा|work=dharmyatra.org|accessdate=3 May 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190321084338/https://dharmyatra.org/shani-chalisa.php|archive-date=21 मार्च 2019|url-status=dead}}</ref> == :जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल। :दीनन के दुःख दूर करि, कीजै नाथ निहाल।। :जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज। :करहूँ कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज।। <poem> :जयति जयति शनिदेव दयाला, करत सदा भक्तन प्रतिपाला, :चारि भुजा, तनु श्याम विराजै, माथे रतन मुकुट छवि छाजै। :परम विशाल मनोहर भाला, टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला, :कुण्डल श्रवन चमाचम चमके, हिये माल मुक्तन मणि दमकै।। </poem> <poem> :कर में गदा त्रिशूल कुठारा, पल बिच करैं अरिहिं संहारा, :पिंगल, कृष्णो, छाया नन्दन, यम, कोणस्थ, रौद्र, दुःख भंजन। :सौरी, मन्द शनि दश नामा, भानु पुत्र पूजहिं सब कामा, :जा पर प्रभु प्रसन्न ह्वै जाहीं, रंकहुं राव करैं क्षण माहीं।। </poem> <poem> :पर्वतहूँ तृण होइ निहारत, तृणहूँ को पर्वत करि डारत, :राज मिलत वन रामहिं दीन्हयो, कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो। :वनहूँ में मृग कपट दिखाई, मातु जानकी गई चुराई, :लखनहिं शक्ति विकल करिडारा, मचिगा दल में हाहाकारा।। </poem> <poem> :रावण की गति-मति बौराई, रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई, :दियो कीट करि कंचन लंका, बजि बजरंग बीर की डंका। :नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा, चित्र मयूर निगलि गै हारा, :हार नौलखा लाग्यो चोरी, हाथ पैर डरवायो तोरी।। </poem> <poem> :भारी दशा निकृष्ट दिखायो, तेलहिं घर कोल्हू चलवायो, :विनय राग दीपक महँ कीन्हों, तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों। :हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी, आपहूँ भरे डोम घर पानी, :तैसे नल पर दशा सिरानी, भूंजी-मीन कूद गई पानी।। </poem> <poem> :श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई, पारवती को सती कराई, :तनिक विकलोकत ही करि रीसा, नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा। :पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी, बची द्रोपदी होति उघारी, :कौरव के भी गति मति मारयो, युद्ध महाभारत करि डारयो।। </poem> <poem> :रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला, लेकर कूदि परयो पाताला, :शेष देव-लखि विनती लाई, रवि को मुख ते दियो छुड़ाई। :वाहन प्रभु के सात सुजाना, हय, दिग्गज, गर्दभ, मृग, स्वाना, :जम्बुक सिंह आदि नख धारी, सो फल ज्योतिष कहत पुकारी।। </poem> <poem> :गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं, हय ते सुख सम्पत्ति उपजावै, :गर्दभ हानि करै बहु काजा, सिंह सिद्ध करै राज समाजा। :जम्बुक बुद्धि नष्ट करि डारै, मृग दे कष्ट प्राण संहारै, :जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी, चोरी आदि होय डर भारी।। </poem> <poem> :तैसहिं चारि चरण यह नामा, स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा, :लौह चरण पर जब प्रभु आवैं, धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं। :समता ताम्र, रजत शुभकारी, स्वर्ण सर्वसुख मंगल भारी, :जो यह शनि चरित्र नित गावै, कबहूँ न दशा निकृष्ट सतावै।। </poem> <poem> :अद्भुत नाथ दिखावैं लीला, करैं शत्रु के नशि बलि ढीला, :जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई, विधिवत शनि ग्रह शांति कराई। :पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत, दीप दान दै बहु सुख पावत, :कहत 'राम सुन्दर' प्रभु दासा, शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा।। </poem> <poem> :पाठ शनिश्चर देव को, की हों विमल तैयार। :करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार।। </poem> ;।। इति राम सुन्दर कृत श्री शनि चालीस सम्पूर्णम् ।।
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