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== पन्द्रहवीं शताब्दी == 15वीं सदी में मानववाद के प्रभाव के कारण इतालवी साहित्य के स्वच्छंद विकास में बाधा पड़ गई। पेत्रार्का के पहले ही प्राचीन युग के अध्येता अल्बेरतीनो मूस्सातो मानववाद की नींव डाल चुके थे। इनका मत था कि मानव आत्मा के सबसे अधिकारी अध्येता प्राचीन थे, उन प्राचीनों की कृतियों का अध्ययन मानववाद है। इस परंपरा के कारण प्राचीन लातीनी रचनाओं, इतिहास आदि का अध्ययन, भाषाओं का अध्ययन तो हुआ, लेकिन इतालवी के स्थान पर लातीनी में रचनाएँ होने लगीं जिनमें मौलिकता बहुत कम रह गई। सभी लेखक प्राचीन मूल साहित्य की ओर मुड़ गए और उसकी शैली की नकल करने लगे। पेत्रार्का से प्रभावित कोलूच्यो सालूताती, ग्रीक और लातीनी रचनाओं के अध्येता, संग्रहकर्ता नीक्कोलो निक्कोली, दार्शनिक प्रबंध और पत्रलेखक पोज्यो ब्राच्यलीनी भाषा, दर्शन, इतिहास पर लिखनेवाले लोरेंजो वाल्ला आदि प्रमुख लेखक हैं। इटली से यह नई धारा यूरोप के अन्य देशों में भी पहुँची और देशानुकूल इसमें परिवर्तन भी हुए। साहित्य के नए आदर्शो का भी मानववादियों ने प्रचार किया। फ्रांचेस्को फीलेल्फो (1398-1481) इस नए साहित्यिक समाज का 15वीं सदी का अच्छा प्रतिनिधि कहा जा सकता है। मानववादी धारा के कवियों का आदर्श प्राचीन कवियों की की रचनाएँ ही थीं, प्रकृति या समसामयिक समाज का इनके लिए कोई महत्त्व नहीं था, किंतु 15वीं सदी के उत्तरार्ध में अनेक साहित्यिक व्यक्तित्व हुए जिनमें से जीरोलामो सावोनारोला (1452-1498) कवि, लूइजी पुलची (1432-1484) सामान्य श्रेणी के हैं। पुलची का नाम उनकी वीरगाथात्मक कृति मोर्गाते के कारण अमर हैं। पुलची की कृति के समान ही मांतेओ मारिआ बोइयार्दो (1441-1494) की कृति ओरलांदो इन्नयोरातो (आसक्त ओरलांदो) हैं। यद्यपि कृति में प्राचीनता की जगह जगह छाप है, तथापि उसमें पर्याप्त प्रवाह और सजीवता है। अपनी सदी का यह सबसे उत्तम प्रेमगीति-काव्य है। कार्लोमान्यो (चार्लीमैग्ना) से संबंधित कथाप्रवादों से कृति का विषय लिया गया है। कृति अधूरी रह गई थी जिसे आरिओस्तो ने पूरा किया। ओरलांदो और रिनाल्दो दो वीर योद्धा थे जो कार्लोमान्यो की सेना में थे। वे दोनों आंजेलिका नामक सुंदरी पर अनुरक्त हो जाते हैं। यही प्रेमकथा नाना अन्य प्रसंगों के साथ कृति का विषय हैं। फ्लोरेंस का रईस लोरेंजो दे" मेदीची उपनाम इल मान्यीफिको (भव्य) (1449-1492) इस आधी सदी का महत्वपूर्ण व्यक्तित्व है। राजनीति तथा साहित्यजगत् दोनों में ही उसने सक्रिय भाग लिया। उसने स्वयं अनेक कृतियाँ लिखीं तथा अनेक साहित्यकों को आश्रय दिया। उनकी कृतियों में गद्य में लिखी प्रेमकथा कोतेंतो, पद्यबद्ध प्रेमकथाएँ-सेल्वे द" अमोरे (प्रेम का वन), आंब्रा, आखेटविषयक कविता काच्चा कोल फाल्कोने (गीध के साथ शिकार), आमोरी दी वेनेरे ए दी मारते (वेनस तथा मार्स का प्रेम) तथा बेओनी काव्यप्रसिद्ध कृतियाँ हैं। मान्यीफिको की प्रतिभा बहुमुखी थी। आंजेलो आंब्रोजीनी उपनाम पोलीत्सियानो (1454-1494) ने ग्रीक और लातीनी में भी रचनाएँ कीं। इतालवी रचनाओं में स्तांजे पेर ला ज्योस्त्रा (फ्लोरेंस के ज्योस्त्रा उत्सव की कविताएँ), संगीत-नाटच-कृति ओरफेओ तथा कुछ कविताएँ प्रधान हैं। पोलित्सियानो की सभी कृतियों का वातावरण प्राचीनता की याद दिलाता है। गद्यलेखकों में लेओन बातीस्ना आल्वेरती, लेओनारदो द" विंची (1452-1519), वेस्पासियानो द" विस्तीच्ची, मांतेओ पाल्मिएरी तथा गद्यकाव्य के क्षेत्र में याकोपो सान्नाज्जारो प्रधान हैं। उसकी कृति आर्कादिया की प्रसिद्धि सारे यूरोप में फैल गई थी। इस सदी में बुद्धिवादी आंदोलन के फलस्वरूप इटली में फ्लोरेंस, रोम, नेपल्स में अकादमियों की स्थापना हुई। मानववादी धारा के ही फलस्वरूप वास्तव में पुनर्जागरण (रिनेशाँ) का विकास इटली में हुआ। अरस्तू के पोएटिक्स के अध्ययन के कारण साहित्य और कला के प्रति दृष्टिकोण कुछ कुछ बदला।
सारांश:
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